आरएसएस के सरसंगठनालय मोहन भागवत ने विभाजनकारी आंदोलन को रोकने और ‘हिंदू आत्मा’ में निहित एकता को बढ़ावा देने की अपील की।
राष्ट्रवादी स्वयंसेवी संघ (आरएसएस) के सरसंगठनालय मोहन भागवत ने 20 अक्टूबर 2026 को विभाजनकारी आंदोलनों के विरुद्ध चेतावनी दी और राष्ट्रीय एकता को ‘हिंदू आत्मा’ में निहित रहने की अपील की, जैसा कि दि हिन्दू ने रिपोर्ट किया।
आरएसएस के प्रमुख का बयान
भाजवत ने सार्वजनिक मंच पर कहा कि देश में कई प्रकार के आंदोलन और विरोध प्रदर्शन सामाजिक सद्भाव को खतरे में डाल रहे हैं। उन्होंने विशेष रूप से उन आंदोलनों को निशाना बनाया जो समुदायों के बीच दरारें पैदा कर रहे हैं, और कहा कि ऐसी विभाजनकारी प्रवृत्तियों को रोकना सभी नागरिकों का कर्तव्य है। उनका मुख्य संदेश यह था कि भारत की सांस्कृतिक जड़ें ‘हिंदू आत्मा’ में निहित हैं और यही आधार राष्ट्रीय एकता का सबसे स्थायी स्तम्भ होना चाहिए।
"Mohan Bhagwat warned against agitations that divide and urged unity rooted in ‘Hindu spirit’." – The Hindu, 20 Oct 2026
भाजवत ने यह भी कहा कि सामाजिक असंतोष को शांतिपूर्ण संवाद और राष्ट्रीय हित के आधार पर सुलझाया जाना चाहिए, न कि हिंसा या ध्रुवीकरण के माध्यम से। उन्होंने विभिन्न सामाजिक समूहों को एकजुट होने और देश के विकास के लिए मिलकर काम करने का आह्वान किया।
पृष्ठभूमि और विचारधारा
राष्ट्रवादी स्वयंसेवी संघ 1925 में स्थापित एक हिन्दुत्व‑आधारित स्वयंसेवी संगठन है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना है। मोहन भागवत, जो 2009 से इस संगठन के सरसंगठनालय के पद पर हैं, ने अपने कार्यकाल में कई बार इस विचारधारा को प्रमुखता दी है। उनके नेतृत्व में आरएसएस ने भारतीय राजनीति में विशेषकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित किए हैं, जिससे उनके बयानों का नीति‑निर्माण पर प्रभाव स्पष्ट है।
आरएसएस की शाखाएँ (शाखा) देश भर में सक्रिय हैं और सामाजिक, शैक्षिक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से ‘हिंदू आत्मा’ को सुदृढ़ करने का काम करती हैं। इस संदर्भ में भागवत का वर्तमान बयान संगठन की दीर्घकालिक रणनीति के साथ मेल खाता है, जिसमें सामाजिक विभाजन को रोकते हुए राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना प्रमुख लक्ष्य है।
राजनीतिक एवं सामाजिक प्रभाव
भाजवत के इस बयान का महत्व इस कारण से भी बढ़ जाता है कि वर्तमान में भारत में कई प्रमुख आंदोलन चल रहे हैं—किसान आंदोलन, जाति‑आधारित आंदोलन, तथा विभिन्न नागरिक समाज समूहों द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन। इन आंदोलनों को आरएसएस ने अक्सर ‘विभाजनकारी’ कहा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनका दृष्टिकोण सामाजिक असंतोष को राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा मानता है।
भाजपा सरकार पर इस बयान के प्रभाव को लेकर विश्लेषकों का मानना है कि यह नीति‑निर्माताओं को सामाजिक असंतोष को नियंत्रित करने के लिए कड़े कदम उठाने के लिए प्रेरित कर सकता है। साथ ही, नागरिक समाज और विपक्षी दल इस बयान को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध के रूप में भी देख सकते हैं, जिससे सार्वजनिक बहस में नई लहरें उठ सकती हैं।
आरएसएस के इस प्रकार के सार्वजनिक बयानों से अक्सर शाकाओं में जागरूकता कार्यक्रम, संगोष्ठी और प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए जाते हैं, जिससे ‘हिंदू आत्मा’ के सिद्धांतों को स्थानीय स्तर पर भी प्रसारित किया जाता है। यह न केवल सामाजिक एकता को सुदृढ़ करता है, बल्कि राजनीतिक रूप से भी संगठन की पकड़ को मजबूत बनाता है।
आगे क्या हो सकता है
भविष्य में यह संभावना है कि विभिन्न राजनीतिक दल और नागरिक‑समाज समूह भागवत के इस आह्वान पर प्रतिक्रिया देंगे। कुछ समूह इस संदेश को राष्ट्रीय एकता के सकारात्मक पहलू के रूप में स्वीकार कर सकते हैं, जबकि अन्य इसे विरोधी आवाज़ों को दबाने के प्रयास के रूप में देख सकते हैं।
आरएसएस संभवतः अपने शाकाओं में इस संदेश को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए कार्यशालाएँ, सार्वजनिक सभाएँ और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करेगा। इस प्रक्रिया में स्थानीय नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
साथ ही, यदि सरकार इस संदेश को नीति‑निर्माण में शामिल करती है, तो हम देख सकते हैं कि सामाजिक आंदोलन पर अधिक कड़ी निगरानी, संवाद‑केन्द्रित समाधान और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जाएगी। यह विकास भारतीय लोकतंत्र के भीतर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक सामंजस्य के बीच संतुलन बनाने की नई चुनौतियों को उजागर करेगा।