सुल्तानपुर। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में दुर्गा पूजा महोत्सव का इतिहास करीब सात दशक पुराना है। वर्ष 1959 में शहर के ठठेरी बाजार में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर शुरू की गई यह परंपरा आज भव्य पंडालों, आकर्षक सजावट और श्रद्धालुओं की भारी भागीदारी के लिए जानी जाती है। कभी तिरपाल के नीचे शुरू हुआ यह धार्मिक आयोजन समय के साथ शहर की सांस्कृतिक पहचान बन गया है।
1959 में ठठेरी बाजार से हुई थी शुरुआत
सुल्तानपुर में दुर्गा पूजा की शुरुआत वर्ष 1959 में ठठेरी बाजार से हुई थी। उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार, बिहार के सीवान जिले के मूल निवासी भिखारी लाल सोनी ने अपने साथियों के सहयोग से यहां मां दुर्गा की पहली प्रतिमा स्थापित की थी। उस समय पूजा के लिए सीमित संसाधन उपलब्ध थे और साधारण तिरपाल के नीचे पंडाल तैयार किया जाता था।
धीरे-धीरे स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ी और शहर के अन्य मोहल्लों तथा बाजारों में भी मां दुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित होने लगीं। इस तरह एक छोटी-सी धार्मिक पहल ने आगे चलकर बड़े दुर्गा पूजा महोत्सव का रूप ले लिया।
1961 में दूसरी प्रतिमा की हुई स्थापना
दुर्गा पूजा की परंपरा को आगे बढ़ाने में स्थानीय लोगों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, वर्ष 1961 में रुहट्ठा गली में बंगाली प्रसाद सोनी ने दूसरी प्रतिमा स्थापित कराई। इसके बाद 1970 के दशक में अन्य प्रतिमाओं की स्थापना भी शुरू हुई।
वर्ष 1973 में अष्टभुजी माता, अंबे माता, गायत्री माता और अन्नपूर्णा माता की प्रतिमाओं की स्थापना के साथ महोत्सव का विस्तार हुआ। धीरे-धीरे यह आयोजन शहर के विभिन्न इलाकों तक पहुंच गया।
आज शहर में सजते हैं सैकड़ों पूजा पंडाल
समय के साथ सुल्तानपुर के दुर्गा पूजा महोत्सव का स्वरूप काफी बदल गया है। अब शहर के विभिन्न इलाकों में आकर्षक पंडाल तैयार किए जाते हैं। इनमें धार्मिक स्थलों से प्रेरित सजावट, रंग-बिरंगी रोशनी और मां दुर्गा की अलग-अलग स्वरूपों वाली प्रतिमाएं श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनती हैं।
अक्टूबर 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, सुल्तानपुर शहर में 500 से अधिक दुर्गा पूजा पंडाल सजने की जानकारी दी गई है। वहीं, 14 अक्टूबर 2026 की अमर उजाला की रिपोर्ट में शहर में 130 से अधिक पूजा पंडालों का उल्लेख है। ये आंकड़े अलग-अलग रिपोर्टों में अलग हैं, इसलिए इनकी गणना के दायरे में अंतर हो सकता है। पूरे जिले की प्रतिमाओं और पंडालों की संख्या शहर के आंकड़ों से अलग है।
ठठेरी बाजार की बड़ी दुर्गा का विशेष महत्व
सुल्तानपुर के प्रमुख पूजा स्थलों में ठठेरी बाजार की बड़ी दुर्गा का विशेष स्थान है। इसी स्थान से शहर में दुर्गा पूजा की ऐतिहासिक परंपरा शुरू हुई थी। इसलिए यहां स्थापित प्रतिमा धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक महत्व भी रखती है।
इसके अलावा चौक क्षेत्र में बड़ी अंबे माता का पंडाल भी लंबे समय से आयोजित होता आ रहा है। वर्ष 1973 से यहां श्री बड़ी अंबे माता पूजा समिति की ओर से पंडाल सजाए जाने का उल्लेख मिलता है। पयागीपुर में विंध्यवासिनी माता की पूजा परंपरा भी शहर के पुराने धार्मिक आयोजनों में शामिल है।
पूजा समितियां निभाती हैं महत्वपूर्ण भूमिका
दुर्गा पूजा महोत्सव को सफल बनाने में स्थानीय पूजा समितियों और आयोजनकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये समितियां प्रतिमाओं की स्थापना, पंडाल निर्माण, सजावट, धार्मिक कार्यक्रमों और श्रद्धालुओं की सुविधाओं की व्यवस्था करती हैं।
शहर में केंद्रीय पूजा व्यवस्था समिति सहित विभिन्न स्थानीय पूजा समितियां आयोजन के संचालन और समन्वय में योगदान देती हैं। हालांकि, सुल्तानपुर शहर और पूरे जिले में सक्रिय सभी समितियों तथा पंजीकृत ट्रस्टों की कुल संख्या का कोई एकीकृत, सत्यापित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
भव्य पंडाल और आकर्षक प्रतिमाएं बनती हैं आकर्षण
दुर्गा पूजा के दौरान सुल्तानपुर में धार्मिक उत्साह का माहौल रहता है। पूजा पंडालों को अलग-अलग विषयों पर सजाया जाता है। कहीं मंदिर जैसी संरचनाएं दिखाई देती हैं तो कहीं विशेष कलाकृतियों और रोशनी के माध्यम से आकर्षक दृश्य तैयार किए जाते हैं।
श्रद्धालु परिवार के साथ मां दुर्गा के दर्शन करने पहुंचते हैं। पूजा समितियों की ओर से कई स्थानों पर भंडारे और धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। हालांकि, किसी एक प्रतिमा को सबसे अधिक देखी जाने वाली प्रतिमा घोषित करने के लिए तुलनात्मक भीड़ या आधिकारिक सर्वेक्षण के आंकड़े आवश्यक हैं।
विसर्जन शोभायात्रा के साथ होता है महोत्सव का समापन
दुर्गा पूजा महोत्सव के अंतिम चरण में प्रतिमाओं की विसर्जन शोभायात्रा निकाली जाती है। इस दौरान श्रद्धालु मां दुर्गा के जयकारे लगाते हुए शोभायात्रा में शामिल होते हैं। सुल्तानपुर में विसर्जन के दौरान सीताकुंड घाट सहित निर्धारित स्थलों पर प्रतिमाओं के विसर्जन की परंपरा रही है।
शोभायात्रा और विसर्जन के अवसर पर प्रशासन की ओर से सुरक्षा तथा यातायात व्यवस्था का प्रबंध किया जाता है। यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ शहर की सामूहिक भागीदारी का भी प्रतीक है।
एक छोटी शुरुआत से बनी शहर की पहचान
सुल्तानपुर का दुर्गा पूजा महोत्सव इस बात का उदाहरण है कि लोगों की आस्था और सामूहिक प्रयास किसी परंपरा को पीढ़ियों तक जीवित रख सकते हैं। वर्ष 1959 में ठठेरी बाजार से शुरू हुआ यह आयोजन आज शहर के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
समय के साथ पंडालों की संख्या, सजावट और आयोजन का विस्तार हुआ है, लेकिन मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा इस महोत्सव का केंद्र बनी हुई है। यही वजह है कि सुल्तानपुर की दुर्गा पूजा आज भी स्थानीय लोगों के लिए विशेष महत्व रखती है।



