कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने महिला आरक्षण के मुद्दे पर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरा है। उन्होंने सवाल उठाया कि सरकार मौजूदा लोकसभा सीटों के आधार पर महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने से किसके कारण रुक रही है।
बेंगलुरु, कर्नाटक। महिला आरक्षण और इसके लागू होने की प्रक्रिया को लेकर देश की सियासत में एक बार फिर बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने महिला आरक्षण के मुद्दे पर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि सरकार विपक्ष की छवि खराब करने और जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रही है। खरगे ने सवाल उठाया कि जब मौजूदा लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों के आधार पर महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण दिया जा सकता है, तो सरकार इसे अभी लागू क्यों नहीं कर रही है? उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के पास वर्तमान सदन की संख्या के आधार पर महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आवंटित करने का विकल्प मौजूद है। ऐसे में सरकार को बताना चाहिए कि उसे ऐसा करने से कौन रोक रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष के इस बयान ने महिला आरक्षण के मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जारी राजनीतिक बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है।
खरगे का आरोप- विपक्ष को बदनाम करने की कोशिश कर रही सरकार
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ उठाने के लिए कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार विपक्ष को महिला आरक्षण का विरोधी बताकर उसकी छवि खराब करना चाहती है, जबकि कांग्रेस पहले भी महिला आरक्षण कानून को पारित कराने की कोशिश कर चुकी है। खरगे ने सवाल किया कि यदि कांग्रेस और विपक्षी दल वास्तव में महिला आरक्षण के खिलाफ होते, तो वे इस कानून को पारित कराने का प्रयास क्यों करते? उनके मुताबिक, विपक्ष की मंशा महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित रखने की नहीं, बल्कि आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया और उससे जुड़ी शर्तों पर सवाल उठाने की है। खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि यह सरकार की एक और राजनीतिक चाल है, जिसके जरिए जनता को गुमराह करके अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, खरगे के इन आरोपों पर केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया सामने आने के बाद ही इस राजनीतिक टकराव के सभी पक्ष स्पष्ट हो सकेंगे।
महिला आरक्षण को लेकर क्या है कांग्रेस अध्यक्ष का सवाल?
मल्लिकार्जुन खरगे के बयान का मुख्य आधार यह है कि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में एक-तिहाई प्रतिनिधित्व देने के लिए मौजूदा सदन की सीटों के आधार पर भी व्यवस्था करने पर विचार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार वर्तमान लोकसभा की कुल सीटों में से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए निर्धारित करने की दिशा में कदम उठा सकती है। खरगे का सवाल है कि जब महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की बात पर व्यापक सहमति जताई जाती है, तो इसे लागू करने में देरी क्यों हो रही है? कांग्रेस अध्यक्ष के अनुसार, सरकार को इस मुद्दे पर केवल राजनीतिक बयानबाजी करने के बजाय महिलाओं को आरक्षण देने की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। विपक्ष लगातार यह मांग उठाता रहा है कि महिला आरक्षण को जल्द से जल्द प्रभावी बनाया जाए। दूसरी ओर, इस कानून के क्रियान्वयन से जुड़ी संवैधानिक और कानूनी व्यवस्थाएं भी चर्चा का विषय हैं। ऐसे में यह बहस केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कानून के प्रावधानों और उन्हें लागू करने की प्रक्रिया का सवाल भी शामिल है।
क्या है नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023?
भारत में महिला आरक्षण से संबंधित कानून को **नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023** कहा जाता है। संसद ने सितंबर 2023 में संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम पारित किया था। इस कानून के तहत लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए लगभग 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में से भी एक-तिहाई सीटें संबंधित वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित करने की व्यवस्था शामिल है। इस कानून का उद्देश्य देश की विधायी संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना और उन्हें राजनीतिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व देना है। हालांकि, अधिनियम में आरक्षण लागू करने के लिए जनगणना के बाद परिसीमन की प्रक्रिया से जुड़ी शर्तें निर्धारित की गई हैं। इसी वजह से कानून पारित होने के बाद भी इसके वास्तविक क्रियान्वयन का मुद्दा राजनीतिक और संवैधानिक चर्चा का विषय बना हुआ है।
परिसीमन और जनगणना से क्यों जुड़ा है महिला आरक्षण?
महिला आरक्षण कानून को लेकर सबसे महत्वपूर्ण सवाल इसके लागू होने की समय-सीमा और प्रक्रिया का है। अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, आरक्षण संबंधित कानून के लागू होने के बाद होने वाली पहली जनगणना के प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित होने और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने से जुड़ा हुआ है। परिसीमन का अर्थ निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व से संबंधित व्यवस्था का पुनर्निर्धारण करना है। इसी प्रक्रिया के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में सीटों के आवंटन से जुड़े बदलाव किए जा सकते हैं। इसलिए कानून पारित हो जाने और महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर चुनाव होने के बीच संवैधानिक प्रक्रियाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। खरगे मौजूदा सदन की संख्या के आधार पर आरक्षण लागू करने का सवाल उठा रहे हैं, लेकिन वर्तमान सीटों में से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए निर्धारित करने और अधिनियम में तय प्रक्रिया के तहत आरक्षण लागू करने के बीच कानूनी अंतर को समझना भी जरूरी है। कानून के मौजूदा प्रावधानों के अनुसार, आरक्षण लागू करने के लिए संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करना होगा। ऐसे में खरगे की मांग के साथ यह सवाल भी अहम है कि क्या मौजूदा व्यवस्था के तहत तत्काल आरक्षण लागू करने के लिए कानूनी या संवैधानिक बदलावों की आवश्यकता होगी।
महिला आरक्षण पर सियासी टकराव क्यों बढ़ रहा है?
महिला आरक्षण का मुद्दा देश की राजनीति में लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की मांग विभिन्न राजनीतिक दलों और महिला संगठनों की ओर से उठाई जाती रही है। वर्ष 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित होने के बाद इसे महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की दिशा में एक बड़ा कदम बताया गया था। हालांकि, इसके लागू होने की प्रक्रिया और समय-सीमा को लेकर राजनीतिक मतभेद बने हुए हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के ताजा बयान से यह स्पष्ट है कि विपक्ष अब इस मुद्दे पर सरकार से जवाब मांग रहा है और आरक्षण को जल्द लागू करने की मांग को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार विपक्ष को महिला आरक्षण विरोधी बताकर राजनीतिक फायदा उठाना चाहती है। वहीं, इस बहस का दूसरा पहलू यह है कि कानून में निर्धारित प्रक्रिया को पूरा किए बिना आरक्षण लागू करने की मांग पर कानूनी और संवैधानिक सवाल उठ सकते हैं। ऐसे में महिला आरक्षण पर जारी विवाद के बीच सरकार की आगे की रणनीति और विपक्ष की मांगों पर होने वाली चर्चा महत्वपूर्ण होगी।
महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने की मांग के बीच बड़ा सवाल
महिला आरक्षण को लेकर मल्लिकार्जुन खरगे का बयान ऐसे समय आया है, जब देश में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने और उन्हें निर्णय लेने वाली संस्थाओं में अधिक अवसर देने पर चर्चा जारी है। खरगे ने केंद्र सरकार से सवाल किया है कि जब मौजूदा सदन की सीटों के आधार पर महिलाओं को एक-तिहाई प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है, तो इसे तत्काल लागू करने की दिशा में कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं। उन्होंने सरकार पर विपक्ष को बदनाम करने और जनता को गुमराह करने का आरोप भी लगाया है। इस बयान से महिला आरक्षण के मुद्दे पर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है। हालांकि, इस पूरे विवाद में राजनीतिक आरोपों के साथ कानून के वास्तविक प्रावधानों और संवैधानिक प्रक्रिया को ध्यान में रखना जरूरी है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि केंद्र सरकार खरगे के सवालों पर क्या जवाब देती है और महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया को लेकर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।