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Explained: CJP का 'चलो संसद' आंदोलन कितना कामयाब? लाठियां, आंसू गैस, पत्थर और हजारों युवा… दोनों तरफ का सच क्या?

दिल्ली में संसद के मानसून सत्र के दौरान आयोजित CJP (Cockroach Janta Party) के 'चलो संसद' आंदोलन ने देशभर का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। परीक्षा प्रणाली में कथित गड़बड़ियों और NEET पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर हजारों छात्र और युवा जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च…

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V K Singh

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Explained: CJP का 'चलो संसद' आंदोलन कितना कामयाब? लाठियां, आंसू गैस, पत्थर और हजारों युवा… दोनों तरफ का सच क्या?

दिल्ली में संसद के मानसून सत्र के दौरान आयोजित CJP (Cockroach Janta Party) के ‘चलो संसद’ आंदोलन ने देशभर का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। परीक्षा प्रणाली में कथित गड़बड़ियों और NEET पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर हजारों छात्र और युवा जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च करने निकले। लेकिन संसद मार्ग पर पुलिस बैरिकेडिंग, प्रदर्शनकारियों की आगे बढ़ने की कोशिश और फिर शुरू हुई झड़पों ने पूरे आंदोलन को हिंसक मोड़ दे दिया। लाठीचार्ज, आंसू गैस, पथराव, हिरासत और सैकड़ों लोगों के घायल होने की खबरों ने इस आंदोलन को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया।

आंदोलन की शुरुआत क्यों हुई?

CJP ने केंद्र सरकार से परीक्षा प्रणाली में सुधार, कथित पेपर लीक मामलों की जवाबदेही तय करने और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे सहित कई मांगों को लेकर ‘चलो संसद’ मार्च का आह्वान किया। आयोजकों का दावा था कि देशभर से हजारों छात्र, अभिभावक और समर्थक दिल्ली पहुंचे ताकि संसद के सामने अपनी आवाज उठा सकें।

प्रदर्शनकारियों का दावा

प्रदर्शन में शामिल लोगों का कहना है कि उनका आंदोलन शांतिपूर्ण था और वे केवल अपनी मांगों को संसद तक पहुंचाना चाहते थे। उनका आरोप है कि पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोकने के लिए जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि लाठीचार्ज और आंसू गैस के कारण भगदड़ मची, जिससे कई छात्र घायल हुए। कुछ नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि महिलाओं और छात्रों के साथ सख्ती बरती गई।

दिल्ली पुलिस का पक्ष

दिल्ली पुलिस का कहना है कि संसद क्षेत्र हाई-सिक्योरिटी जोन है और प्रदर्शनकारियों ने कई जगह बैरिकेड तोड़कर प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करने की कोशिश की। पुलिस के अनुसार भीड़ के एक हिस्से ने पथराव किया, जिसमें बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी घायल हुए। इसके बाद स्थिति को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े गए, लाठीचार्ज किया गया और कई लोगों को हिरासत में लिया गया।

आखिर हिंसा कैसे शुरू हुई?

प्रत्यक्षदर्शियों और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, जब प्रदर्शनकारी संसद की ओर बढ़े तो कई जगह बैरिकेड लगाए गए थे। भीड़ और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की हुई। इसके बाद हालात तेजी से बिगड़े और दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर हिंसा शुरू करने का आरोप लगाया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि पहले पुलिस ने बल प्रयोग किया, जबकि पुलिस का दावा है कि पहले बैरिकेड तोड़े गए और पथराव हुआ। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सभी मामलों में नहीं हो सकी है।

क्या आंदोलन सफल रहा?

यदि भीड़ जुटाने की बात करें तो यह हाल के वर्षों के सबसे बड़े छात्र आंदोलनों में से एक माना जा रहा है। देश के कई राज्यों से बड़ी संख्या में युवा दिल्ली पहुंचे और आंदोलन ने राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और मीडिया का ध्यान आकर्षित किया। विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को संसद और सड़क दोनों जगह उठाया।

हालांकि, यदि सभी मांगों के तत्काल समाधान की बात करें तो आंदोलन से तुरंत कोई बड़ा नीतिगत फैसला सामने नहीं आया। लेकिन सरकार की ओर से बातचीत के संकेत मिले और CJP नेतृत्व ने दावा किया कि उनकी आवाज सत्ता तक पहुंची। बाद में संगठन ने कहा कि वह आगे आंदोलन जारी रखेगा, लेकिन दोबारा संसद मार्च नहीं करेगा ताकि और हिंसा व चोटों से बचा जा सके।

राजनीतिक असर

इस आंदोलन ने शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा पारदर्शिता और युवाओं के मुद्दों को फिर से राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है। विपक्ष सरकार पर छात्रों की आवाज दबाने का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार और पुलिस का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उनकी जिम्मेदारी है और संसद की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष

‘चलो संसद’ आंदोलन केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि युवाओं के गुस्से और शिक्षा व्यवस्था को लेकर बढ़ती चिंता का बड़ा प्रतीक बनकर सामने आया। दूसरी ओर, संसद की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी का हवाला देते हुए पुलिस ने अपनी कार्रवाई को उचित बताया। ऐसे में सच का एक पक्ष नहीं, बल्कि दो अलग-अलग दावे हैं। निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो आंदोलन अपने मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने में सफल रहा, लेकिन हिंसक झड़पों ने इसकी मूल मांगों से ध्यान भी भटका दिया। आगे यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार, आंदोलनकारी और विपक्ष इस मुद्दे को किस दिशा में लेकर जाते हैं।

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