लखनऊ के ठाकुरगंज स्थित एक निजी अस्पताल पर गंभीर आरोप लगे हैं कि मृत मरीज को जिंदा बताकर पांच दिन तक वेंटिलेटर पर रखा गया और परिजनों से करीब ₹5 लाख वसूले गए। सीतापुर निवासी मरीज के परिजनों की शिकायत पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मामले का संज्ञान लिया है।
लखनऊ में निजी अस्पताल पर गंभीर आरोप, डीएम को समन जारी; 8 दिसंबर को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सामने पेश होने का आदेश
लखनऊ के ठाकुरगंज स्थित एक निजी अस्पताल में मरीज की मौत के बाद भी उसे कथित तौर पर पांच दिन तक वेंटिलेटर पर रखकर इलाज के नाम पर परिजनों से पांच लाख रुपये वसूलने का मामला सामने आया है। इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लेते हुए सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने चिकित्सा शिक्षा विभाग की प्रमुख सचिव वी. हेकाली झिमोमी को मामले की जांच के निर्देश देने के साथ ही लखनऊ के जिलाधिकारी को समन जारी कर जवाब मांगा है। आयोग ने निर्धारित समय पर रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराने पर नाराजगी जताते हुए जिलाधिकारी को आख्या सहित व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है।
डेंगू पीड़ित विशाल पांडेय को अस्पताल में कराया गया था भर्ती
मामला सीतापुर जिले के अटरिया क्षेत्र स्थित दरियापुर गांव के निवासी विशाल पांडेय से जुड़ा है। जानकारी के मुताबिक, डेंगू से पीड़ित विशाल को 20 अक्टूबर 2024 को ठाकुरगंज के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनकी हालत गंभीर होने के कारण उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था। परिजनों का आरोप है कि विशाल की मौत होने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने उन्हें पांच दिनों तक वेंटिलेटर पर रखा और परिवार को उनकी स्थिति के बारे में सही जानकारी नहीं दी।
परिवार का दावा है कि जब उन्हें संदेह हुआ तो वे जबरन वार्ड में पहुंचे। वहां विशाल को मृत पाया गया। आरोप के मुताबिक, उनके शरीर से दुर्गंध भी आ रही थी। इसके बाद परिजनों ने अस्पताल में हंगामा किया। परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि मरीज को जिंदा बताकर इलाज जारी रखने के नाम पर उनसे करीब पांच लाख रुपये वसूले गए। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि जांच रिपोर्ट और संबंधित पक्षों के आधिकारिक बयान से होनी बाकी है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में दर्ज कराई गई शिकायत
इस मामले की शिकायत विशाल के परिचित और महाराष्ट्र के ठाणे निवासी आसिफ आबिद खान ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में दर्ज कराई। शिकायत के बाद आयोग ने मामले पर कार्रवाई शुरू की और 21 जनवरी 2025 को लखनऊ के जिलाधिकारी को आख्या प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
इसके बाद 22 अगस्त 2025 को पुलिस आयुक्त, कमिश्नरेट की ओर से आयोग को रिपोर्ट उपलब्ध कराई गई। रिपोर्ट में चिकित्सकीय विशेषज्ञ की राय लिए जाने का उल्लेख था। मामले की गंभीरता को देखते हुए आयोग ने आगे की जानकारी मांगी, ताकि आरोपों की जांच और संबंधित तथ्यों की स्थिति स्पष्ट हो सके।
रिपोर्ट नहीं मिलने पर आयोग ने जताई नाराजगी
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 30 जनवरी 2026 को जिलाधिकारी को दो सप्ताह के भीतर आख्या उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। हालांकि, निर्धारित अवधि में जवाब नहीं मिलने पर आयोग ने नाराजगी जताई। इसके बाद मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत जिलाधिकारी को समन जारी किया गया।
आयोग ने निर्देश दिया है कि जिलाधिकारी मामले की रिपोर्ट के साथ **8 दिसंबर को सुबह 11 बजे नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष उपस्थित हों।** हालांकि, आयोग ने यह विकल्प भी दिया है कि यदि जिलाधिकारी एक दिसंबर तक अपनी आख्या प्रस्तुत कर देते हैं, तो उन्हें व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं होगी।
सीएमओ बोले—तैयार कराई जा रही जांच रिपोर्ट
मामले में मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. एनबी सिंह ने बताया कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की ओर से जांच रिपोर्ट मांगी गई है और इसे तैयार कराया जा रहा है। उनके मुताबिक, शिकायतकर्ता को बयान दर्ज कराने के लिए कई बार पत्र भेजे गए, लेकिन वह बयान दर्ज कराने नहीं पहुंचे। सीएमओ ने कहा कि पूरे मामले की रिपोर्ट आयोग को भेजी जा रही है।
फिलहाल, मामले में अस्पताल पर लगाए गए आरोपों की वास्तविकता जांच और संबंधित पक्षों के जवाब के बाद ही स्पष्ट होगी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की कार्रवाई के बाद अब प्रशासनिक रिपोर्ट और जांच के निष्कर्षों पर नजर रहेगी।