नई दिल्ली:
अगर आपकी जांघों, कूल्हों या पैरों में चर्बी लगातार बढ़ रही है और डाइटिंग या एक्सरसाइज के बावजूद कम नहीं हो रही, तो इसे सिर्फ सामान्य मोटापा समझकर नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह लिपेडेमा (Lipedema) नामक बीमारी का संकेत भी हो सकता है। यह एक दीर्घकालिक (क्रॉनिक) स्थिति है, जिसमें शरीर के निचले हिस्से में असामान्य रूप से फैट जमा होने लगता है।
लिपेडेमा मुख्य रूप से महिलाओं में देखा जाता है और अक्सर किशोरावस्था, गर्भावस्था या रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज़) जैसे हार्मोनल बदलावों के दौरान विकसित हो सकता है। इस बीमारी में दोनों पैरों या जांघों में समान रूप से चर्बी बढ़ती है, जबकि पैरों के पंजे सामान्य बने रह सकते हैं। यही कारण है कि इसे कई बार सामान्य मोटापे या वजन बढ़ने की समस्या समझ लिया जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, लिपेडेमा के प्रमुख लक्षणों में जांघों और कूल्हों में असामान्य चर्बी जमा होना, पैरों में भारीपन महसूस होना, हल्का दबाव पड़ने पर दर्द होना, आसानी से नीले निशान (ब्रूज़) पड़ जाना और लंबे समय तक खड़े रहने पर सूजन शामिल हैं। कई मरीजों को चलने-फिरने में भी असुविधा होने लगती है।
डॉक्टर बताते हैं कि सामान्य मोटापे में वजन कम करने से शरीर की चर्बी घटती है, लेकिन लिपेडेमा में प्रभावित हिस्सों की चर्बी अक्सर डाइट और व्यायाम से बहुत कम प्रभावित होती है। इसलिए समय पर सही पहचान और इलाज बेहद जरूरी है।
लिपेडेमा का इलाज मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है। शुरुआती चरण में कंप्रेशन थेरेपी, नियमित व्यायाम, फिजियोथेरेपी, वजन नियंत्रित रखना और संतुलित आहार से लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। गंभीर मामलों में विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह पर लिपोसक्शन जैसी प्रक्रिया पर भी विचार किया जा सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि जांघों या पैरों में असामान्य रूप से चर्बी बढ़ रही हो, दर्द या सूजन बनी रहती हो और सामान्य वजन घटाने के उपाय असर न कर रहे हों, तो स्वयं इलाज करने के बजाय किसी वैस्कुलर सर्जन, डर्मेटोलॉजिस्ट या लिंफेडेमा विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए। समय पर पहचान होने से बीमारी को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है और जीवन की गुणवत्ता में सुधार संभव है।








