नई दिल्ली। समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में कहा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले BJP-NDA के शासन वाले 21 राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य है। इसके बाद NDA के भीतर भी
नई दिल्ली। समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में कहा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले BJP-NDA के शासन वाले 21 राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य है। इसके बाद NDA के भीतर भी अलग-अलग दलों के रुख को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
BJP का UCC पर साफ रुख
UCC भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख वैचारिक मुद्दों में शामिल रहा है। पार्टी का तर्क है कि विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत कानूनों में धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यवस्था की जगह सभी नागरिकों के लिए समान नियम होने चाहिए। 2026 में गुजरात विधानसभा से UCC विधेयक पारित होने के बाद अमित शाह ने भी इसे BJP की पुरानी प्रतिबद्धता बताया था।
NDA में कौन बीजेपी के साथ?
UCC के मुद्दे पर NDA के सभी सहयोगी दलों का रुख एक जैसा नहीं है। शिवसेना (शिंदे गुट) और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) ने UCC का समर्थन किया है। शिवसेना नेता श्रीकांत शिंदे ने इसे समानता, न्याय और राष्ट्रीय एकता से जोड़ते हुए समर्थन जताया है।
TDP ने भी UCC का सैद्धांतिक समर्थन किया है, लेकिन पार्टी का कहना है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर सभी पक्षों से व्यापक चर्चा जरूरी है। यानी TDP का समर्थन फिलहाल शर्तों और विचार-विमर्श के साथ जुड़ा हुआ है।
JDU ने बढ़ाई BJP की चिंता
सबसे ज्यादा चर्चा जनता दल यूनाइटेड (JDU) के रुख को लेकर है। JDU ने बिहार में UCC लागू करने को लेकर आपत्ति जताई है। पार्टी ने संकेत दिया है कि वह पहले प्रस्तावित ड्राफ्ट को देखेगी और उसके बाद केंद्र के साथ बातचीत करेगी।
यानी JDU NDA का हिस्सा होने के बावजूद UCC को लेकर BJP के साथ पूरी तरह सहमत नजर नहीं आ रही है। यही वजह है कि इस मुद्दे पर NDA के अंदर मतभेद की चर्चा तेज हो गई है।
चिराग पासवान की पार्टी का क्या रुख?
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) भी अभी UCC पर जल्दबाजी में समर्थन देने के पक्ष में नहीं है। चिराग पासवान की पार्टी ने संकेत दिया है कि पहले प्रस्तावित कानून का ड्राफ्ट देखा जाएगा और उसके बाद अंतिम फैसला लिया जाएगा।
विपक्ष में कौन-कौन UCC के खिलाफ?
विपक्षी खेमे में कांग्रेस, DMK और AIMIM जैसे दल UCC का विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस ने इसे लेकर सवाल उठाए हैं, जबकि DMK ने UCC को संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों के संदर्भ में चुनौती दी है। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी भी इसके मुखर विरोधियों में शामिल हैं।
विपक्षी दलों का मुख्य तर्क है कि भारत में अलग-अलग समुदायों की धार्मिक और सामाजिक परंपराएं हैं। ऐसे में सभी पर एक समान व्यक्तिगत कानून लागू करने से धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विविधता से जुड़े सवाल खड़े हो सकते हैं।
किन राज्यों में UCC आगे बढ़ चुका है?
UCC को लेकर BJP शासित राज्यों ने राज्य स्तर पर कदम उठाने की रणनीति अपनाई है। उत्तराखंड में UCC लागू किया जा चुका है। इसके बाद गुजरात ने 2026 में UCC विधेयक पारित किया। असम और मध्य प्रदेश में भी UCC को लेकर महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल
अमित शाह के 2029 से पहले NDA शासित 21 राज्यों में UCC लागू करने के लक्ष्य के बाद असली चुनौती NDA के भीतर सहमति बनाने की है। BJP जहां इसे समान कानून और समान अधिकार का मुद्दा बता रही है, वहीं उसके कुछ सहयोगी दल सावधानी बरत रहे हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस, DMK और AIMIM समेत विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं।
ऐसे में आने वाले दिनों में UCC सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बन सकता है। खासकर JDU, TDP और LJP (रामविलास) जैसे सहयोगी दलों का अंतिम रुख यह तय करने में अहम होगा कि BJP अपने UCC एजेंडे को NDA के भीतर कितनी आसानी से आगे बढ़ा पाती है।