उत्तर प्रदेश के बंटवारे की पुरानी मांग एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गई है। देवरिया के सोनूघाट स्थित जनता इंटर कॉलेज में 20 सितंबर 2026 को आयोजित सुभासपा की ‘सामाजिक समरसता महारैली’ में पार्टी अध्यक्ष और यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश…
उत्तर प्रदेश के बंटवारे की पुरानी मांग एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गई है। देवरिया के सोनूघाट स्थित जनता इंटर कॉलेज में 20 सितंबर 2026 को आयोजित सुभासपा की ‘सामाजिक समरसता महारैली’ में पार्टी अध्यक्ष और यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश चार हिस्सों में बंटेगा। उन्होंने यह भी कहा कि अगर पूर्वांचल अलग राज्य बनता है तो वहां राजभर समाज का बेटा पहला मुख्यमंत्री बनेगा।
राजभर ने इसी मंच से 27 फीसदी OBC आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण की मांग भी दोहराई। उनका कहना है कि पिछड़े वर्ग की अलग-अलग जातियों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, राजभर ने जातिगत जनगणना के बाद राज्य के पुनर्गठन के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत और भरोसे का भी दावा किया है। हालांकि, यह राजभर का दावा है और फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से उत्तर प्रदेश के चार राज्यों में विभाजन को लेकर कोई नया आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है।
चुनाव से पहले UP बांटने का बयान क्यों?
राजभर का बयान ऐसे समय आया है जब 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की राजनीतिक तैयारियां तेज हो रही हैं। पूर्वांचल की राजनीति में सुभासपा का आधार और राजभर समाज की राजनीतिक भूमिका को देखते हुए अलग पूर्वांचल राज्य और राजभर समाज के मुख्यमंत्री की बात को उनके राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
राजभर ने अपने भाषण में पूर्वांचल को अलग राज्य बनाने की मांग को बड़े राजनीतिक लक्ष्य के रूप में पेश किया। इसके साथ ही उन्होंने OBC आरक्षण में हिस्सेदारी का मुद्दा उठाकर पिछड़ी जातियों के बीच अपनी राजनीतिक मांगों को जोड़ने की कोशिश की।
हालांकि, यह कहना कि उत्तर प्रदेश का विभाजन केवल किसी राजनीतिक बयान के आधार पर होने जा रहा है, सही नहीं होगा। किसी राज्य की सीमाओं या उसके गठन में बदलाव के लिए संविधान में निर्धारित संसदीय प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है।
क्या केंद्र सरकार अकेले UP को बांट सकती है?
संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्य के गठन या किसी मौजूदा राज्य के क्षेत्र, सीमा अथवा नाम में बदलाव का अधिकार संसद के पास है। लेकिन ऐसे विधेयक को संसद में पेश करने के लिए राष्ट्रपति की सिफारिश जरूरी होती है। यदि प्रस्ताव किसी राज्य के क्षेत्र या सीमाओं को प्रभावित करता है तो राष्ट्रपति उसे संबंधित राज्य की विधानसभा के पास उसकी राय जानने के लिए भेजते हैं। विधानसभा की राय संसद पर बाध्यकारी नहीं होती।
यानी उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में बांटना एक लंबी संवैधानिक और राजनीतिक प्रक्रिया होगी। इसके लिए केवल राज्य सरकार या किसी मंत्री की घोषणा पर्याप्त नहीं है।
UP के चार हिस्सों का पुराना प्रस्ताव क्या था?
उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन की मांग नई नहीं है। नवंबर 2011 में तत्कालीन मायावती सरकार ने विधानसभा में उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव पारित किया था। उस समय पूर्वांचल, बुंदेलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और अवध जैसे क्षेत्रों को अलग राज्यों के रूप में गठित करने की बात सामने आई थी।
यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया, लेकिन आगे राज्य पुनर्गठन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई। यही वजह है कि यूपी के विभाजन का मुद्दा समय-समय पर राजनीतिक बहस में लौटता रहा है।
पूर्वांचल को लेकर राजभर की राजनीति
राजभर का मौजूदा दावा मुख्य रूप से पूर्वांचल पर केंद्रित है। उनका कहना है कि अगर अलग पूर्वांचल राज्य बनता है तो पहला मुख्यमंत्री राजभर समाज से होना चाहिए।
यह एक राजनीतिक मांग और भविष्य की परिकल्पना है, न कि किसी मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा। अलग राज्य बनने की स्थिति में मुख्यमंत्री कौन होगा, इसका फैसला उस समय बनने वाली राजनीतिक परिस्थितियों और विधानसभा के बहुमत से होगा।
27 फीसदी OBC आरक्षण में उप-वर्गीकरण का मुद्दा
राजभर ने राज्य के बंटवारे के साथ OBC आरक्षण के भीतर हिस्सेदारी का मुद्दा भी उठाया है। उनका तर्क है कि 27 फीसदी OBC आरक्षण का लाभ सभी पिछड़ी जातियों को उनकी आबादी के अनुपात में मिलना चाहिए।
रैली में उन्होंने OBC कोटे के भीतर अलग-अलग हिस्सेदारी की मांग दोहराई। यह मुद्दा खास तौर पर उन पिछड़ी जातियों से जुड़ा है जो मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में अपनी हिस्सेदारी कम होने की बात करती रही हैं। राजभर की राजनीति में यह मांग लंबे समय से महत्वपूर्ण मुद्दा रही है।
क्या यह सिर्फ चुनावी मुद्दा है?
राजभर के बयान को चुनावी राजनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है, लेकिन इसके पीछे राज्य पुनर्गठन की पुरानी मांग भी मौजूद है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि 20 सितंबर की रैली में उन्होंने उत्तर प्रदेश के चार हिस्सों में बंटने की बात कही है और पूर्वांचल बनने की स्थिति में राजभर समाज के मुख्यमंत्री की बात रखी है।
लेकिन अभी उत्तर प्रदेश के चार राज्यों में विभाजन का कोई नया सरकारी फैसला नहीं हुआ है। राज्य का पुनर्गठन होने के लिए संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद की प्रक्रिया से गुजरना होगा।
इसलिए फिलहाल इसे ओम प्रकाश राजभर की राजनीतिक मांग और दावा कहना ज्यादा सटीक है, न कि उत्तर प्रदेश के चार हिस्सों में बंटने का आधिकारिक फैसला।
यह संस्करण आपके पोर्टल के लिए “दावा बनाम संवैधानिक प्रक्रिया” एंगल को साफ रखता है और जातीय आंकड़ों को बिना पर्याप्त आधिकारिक स्रोत के तथ्य के रूप में पेश करने से बचता है।