बिहार के एक छोटे से जिले से निकलकर दुनिया के सबसे बड़े टेक बाजार पर कब्जा करना किसी फिल्मी कहानी जैसा लगता है. लेकिन यह सच कर दिखाया है दो जुडवा भाइयों ने. आज जब पूरी दुनिया सिलिकॉन वैली की तरफ देखती है, तब इन दो भाइयों ने बिहार की मिट्टी से उठकर एक ऐसा स्टार्टअप खड़ा कर दिया, जिसने बड़ी-बड़ी कंपनियों की नींद उड़ा दी है. यह कहानी है इमर्जेंट (Emergent) की, जिसने कोडिंग जैसे मुश्किल काम को बच्चों का खेल बना दिया. महज 7 महीनों में 50 लाख से ज्यादा यूजर्स और 400 करोड़ रुपये (50 मिलियन डॉलर) की सालाना कमाई तक पहुंचना कोई मामूली बात नहीं है. यह कहानी उन लाखों युवाओं के लिए है, जो सोचते हैं कि बडे सपने देखने के लिए बड़े शहर में पैदा होना जरूरी है.
इन दोनों जुड़वा भाइयों मुकुंद झा और माधव झा की परवरिश बेहद साधारण माहौल में हुई. घर में अक्सर बिजली चली जाती थी, इंटरनेट की रफ्तार सुस्त रहती थी, लेकिन जिज्ञासा कभी धीमी नहीं हुई. बचपन से ही उन्हें मशीनों और कंप्यूटरों में कुछ अलग करने की ललक थी. जैसे-जैसे वे बड़े हुए, उन्होंने महसूस किया कि कोडिंग सीखना हर किसी के बस की बात नहीं है. आसपास ऐसे कई लोग थे जिनके पास शानदार बिजनेस आइडिया थे, लेकिन तकनीकी जानकारी की कमी उनके रास्ते की सबसे बड़ी दीवार बन जाती थी. किसी के पास महंगे डेवलपर रखने का बजट नहीं था और किसी के पास समय नहीं कि वह खुद प्रोग्रामिंग सीखे.

कोडिंग को बना दिया बच्चों का खेल

यहीं से उनके मन में एक सवाल पैदा हुआ. क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इंसान कंप्यूटर से सामान्य तरीके से बात करे और कंप्यूटर खुद ऐप बना दे? इसी सोच ने आगे चलकर एक बड़े प्रॉडक्ट की नींव रखी. पढ़ाई पूरी करने के बाद जब उन्होंने इस विचार पर काम शुरू किया तो आसपास के लोगों ने इसे नामुमकिन बताया. कई लोगों ने मजाक उड़ाया और कहा कि बिना कोड लिखे सॉफ्टवेयर बनाना सिर्फ कल्पना है. लेकिन दोनों भाइयों को अपने विचार पर पूरा भरोसा था. उन्होंने एक छोटे से कमरे को अपना दफ्तर बनाया और दिन-रात प्रयोग करते रहे.
लंबी मेहनत के बाद मुकुंद झा और माधव झा ने 2024 में Emergent AI स्टार्टअप शुरू किया, जो आज दुनिया के सबसे तेज बढ़ते AI प्लेटफॉर्म्स में शुमार है. मुकुंद (CEO) ने पहले Dunzo के को-फाउंडर और CTO के रूप में काम किया था, जबकि माधव (CTO) ने AI और क्लाउड सिस्टम्स में गहन अनुभव हासिल किया. बचपन से ही दोनों प्रोग्रामिंग करते आए थे. इन्होंने 12 साल की उम्र से कोडिंग शुरू की थी. दुनिया के इस पहले “एजेंटिक वाइब कोडिंग” प्लेटफॉर्म पर किसी को एक लाइन भी कोड लिखने की जरूरत नहीं होती. इसका इस्तेमाल करना बिल्कुल चैट करने जैसा आसान है. यूजर बस अपनी जरूरत लिखता है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बाकी सारा काम खुद संभाल लेता है. उदाहरण के तौर पर कोई लिख सकता है- “मुझे एक ऐसा ऐप चाहिए जहां लोग पुरानी किताबें बेच सकें और पेमेंट सीधे बैंक खाते में आए.” इतना लिखते ही सिस्टम डिजाइन तैयार करता है, डेटाबेस बनाता है और कुछ ही मिनटों में पूरा काम करने वाला ऐप बना देता है.
इस तकनीक की खास बात यह है कि बनाए गए ऐप सिर्फ दिखावे के लिए नहीं होते, बल्कि असली बिजनेस में सीधे इस्तेमाल किए जा सकते हैं. यही वजह है कि लॉन्च होते ही इमर्जेंट की चर्चा तेजी से फैल गई. जिन कामों में पहले महीनों लग जाते थे और लाखों रुपये खर्च होते थे, वही काम अब बेहद कम समय और कम लागत में संभव हो गया. छोटे दुकानदार, नए उद्यमी और बड़े स्टार्टअप तक, सभी ने इस प्लेटफॉर्म को हाथों-हाथ अपनाया.

7 महीनों में 50 लाख से ज्यादा यूजर, मिल रही फंडिंग

सिर्फ सात महीनों के भीतर इमर्जेंट से जुड़ने वाले यूजर्स की संख्या 50 लाख से ज्यादा पहुंच गई और कंपनी की सालाना कमाई करीब 400 करोड़ रुपये यानी 50 मिलियन डॉलर तक पहुंच गई. Khosla Ventures, SoftBank जैसी बड़ी फंडिंग मिली. इतनी कम अवधि में यह उपलब्धि हासिल करना किसी भी स्टार्टअप के लिए असाधारण माना जाता है. लेकिन दोनों भाइयों के लिए यह मंजिल नहीं, बल्कि शुरुआत है. उनका सपना है कि भारत का हर व्यक्ति, जिसके पास कोई नया विचार है, तकनीक की कमी की वजह से पीछे न रह जाए.