धीरेंद्र शास्त्री के समर्थन में आए मथुरा-वृंदावन के संत, बोले- श्रीकृष्ण के त्रिभंगी स्वरूप का वर्णन सदियों पुरानी परंपरा
बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप को लेकर दिए गए बयान पर जारी विवाद के बीच अब मथुरा-वृंदावन के कई संत और धर्माचार्य उनके समर्थन में सामने आए हैं। वृंदावन के ऐतिहासिक श्री राधाकांत मंदिर में ब्रज तीर्थ देवालय न्यास और धर्म रक्षा संघ के संयुक्त तत्वावधान में संतों एवं धर्माचार्यों की एक बड़ी सभा आयोजित की गई। बैठक में वक्ताओं ने धीरेंद्र शास्त्री के बयान को ब्रज की रसिक और भक्ति परंपरा के संदर्भ में समझने की अपील की।
सभा की अध्यक्षता महंत फूलडोल बिहारी दास महाराज ने की। बैठक में मौजूद संतों ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के त्रिभंगी स्वरूप का वर्णन सनातन धर्म की प्राचीन परंपरा का हिस्सा है। भक्त कवियों, रसिक संतों और आचार्यों ने सदियों से अपने आराध्य के स्वरूप का प्रेम और भक्ति भाव से वर्णन किया है। ऐसे में किसी कथन को उसके संदर्भ से अलग करके विवाद खड़ा करना उचित नहीं है।
त्रिभंगी स्वरूप को लेकर संतों ने क्या कहा?
भागवताचार्य मृदुल कांत शास्त्री ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का त्रिभंगी स्वरूप सनातन धर्म की प्राचीन और दिव्य परंपरा का हिस्सा है। भक्त कवियों और आचार्यों ने सदियों से भगवान के इस अलौकिक स्वरूप का वर्णन किया है। उनके अनुसार, किसी भक्त द्वारा अपने आराध्य के स्वरूप का भावपूर्ण वर्णन करना अपमान नहीं माना जाना चाहिए।
वहीं, अखाड़ा परिषद वृंदावन के अध्यक्ष महंत हरिशंकर दास नागा ने कहा कि ठाकुरजी की बांकी चितवन, बांकी अदा और त्रिभंगी मुद्रा का वर्णन रसिक संतों की परंपरा में लंबे समय से होता आया है। इसलिए धीरेंद्र शास्त्री के कथन को इसी भक्ति परंपरा के संदर्भ में समझना चाहिए।
संतों ने की सनातन समाज से एकजुट रहने की अपील
धर्म रक्षा संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष सौरभ गौड़ ने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का समर्थन करते हुए कहा कि वह सनातन धर्म और हिंदू समाज को जागृत करने का काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी कथन को उसके मूल भाव और संदर्भ से अलग करके विवाद का रूप देना उचित नहीं है।
ब्रज तीर्थ देवालय न्यास के महामंत्री आर.के. पांडेय ने कहा कि ब्रजभूमि के कण-कण में भगवान श्रीकृष्ण का वास है। श्रीबांके बिहारी का स्वरूप भगवान के मनमोहक त्रिभंगी रूप से जुड़ा हुआ है। ऐसे में इस विषय को ब्रज की रसिक परंपरा के दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है।
महंत फूलडोल बिहारी दास ने दिया यह संदेश
सभा की अध्यक्षता कर रहे महंत फूलडोल बिहारी दास महाराज ने कहा कि भगवान और भक्त के बीच प्रेम, वात्सल्य, सख्य तथा माधुर्य जैसे अनेक भावों की समृद्ध परंपरा रही है। जब तक किसी कथन के पीछे दुर्भावना न हो, तब तक उसे अनावश्यक विवाद का विषय बनाने के बजाय उसके आध्यात्मिक भाव को समझना चाहिए।
ब्रज तीर्थ देवालय न्यास के अध्यक्ष रमाकांत गोस्वामी ने भी सनातन समाज से आपसी विवादों में अपनी ऊर्जा खर्च करने के बजाय संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण पर ध्यान देने की अपील की। स्वामी देवानंद परमहंस और ब्राह्मण सेवा संघ के अध्यक्ष आनंद बल्लभ गोस्वामी ने भी संवाद, संयम और आपसी सौहार्द बनाए रखने पर जोर दिया।
क्या है पूरा विवाद?
दरअसल, मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करेरा में रामकथा के दौरान धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप की तुलना करते हुए कुछ टिप्पणियां की थीं। उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मथुरा-वृंदावन सहित कई स्थानों पर विरोध शुरू हो गया। कुछ संतों और धार्मिक संगठनों ने इन टिप्पणियों को भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनुचित बताते हुए नाराजगी जताई थी।
विवाद बढ़ने के बाद धीरेंद्र शास्त्री ने सोशल मीडिया पर वीडियो संदेश जारी कर सफाई दी और कहा कि उनका उद्देश्य भगवान श्रीकृष्ण का अपमान करना या भगवान राम और कृष्ण में कोई भेद करना नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनकी बातों से किसी की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं तो वह इसके लिए क्षमा मांगते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच वृंदावन में हुई संतों की सभा ने विवाद को एक नया मोड़ दे दिया है। जहां कुछ संत पहले शास्त्री की टिप्पणियों का विरोध कर रहे थे, वहीं अब कई धर्माचार्य उनके समर्थन में सामने आए हैं। संतों की ओर से दिया गया संदेश है कि धार्मिक विषयों पर किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले कथन के भाव, संदर्भ और परंपरा को समझना जरूरी है।
फिलहाल, भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप को लेकर शुरू हुआ यह विवाद धार्मिक और सामाजिक चर्चाओं में बना हुआ है।