जावेद अख्तर ने ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम समाज में सुधार को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जरूरी सामाजिक और धार्मिक सुधारों के लिए केवल सरकार के हस्तक्षेप का इंतजार क्यों किया जाए, बल्कि बदलाव की पहल समुदाय के भीतर से भी होनी चाहिए।
मुंबई। मशहूर लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने मुस्लिम पर्सनल लॉ और सामाजिक सुधारों को लेकर अपनी राय रखी है। एक इंटरव्यू में उन्होंने तत्काल तीन तलाक पर रोक लगाने के लिए कानून बनाए जाने का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि मुस्लिम समुदाय के भीतर जरूरी सुधार खुद क्यों नहीं किए गए और इसके लिए सरकार के हस्तक्षेप का इंतजार क्यों करना पड़ा।
‘बीजेपी को ट्रिपल तलाक पर कानून क्यों बनाना पड़ा?’
इंडियन एक्सप्रेस हिंदी को दिए इंटरव्यू में जावेद अख्तर ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ 1937 में अस्तित्व में आया, जबकि भारत को 1947 में आजादी मिली। उन्होंने सवाल किया कि आजादी के बाद लंबे समय तक इसमें बदलाव की पहल क्यों नहीं हुई। उनके मुताबिक, किसी सामाजिक प्रथा में सुधार की जरूरत हो तो उसकी शुरुआत समुदाय के भीतर से होनी चाहिए।
जावेद अख्तर ने ट्रिपल तलाक पर रोक लगाने के लिए बीजेपी नेतृत्व वाली सरकार को कानून बनाने की जरूरत पड़ने पर भी सवाल उठाया। उन्होंने इसे शर्मनाक स्थिति बताते हुए इसे सेक्युलरिज्म की बहस से जोड़ा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बना कानून
तत्काल तीन तलाक को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने **22 अगस्त 2017** को ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। पांच जजों की संविधान पीठ ने 3:2 के बहुमत से तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक और मनमाना करार दिया था। इसके बाद केंद्र सरकार ने कानून बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई।
जुलाई 2019 में संसद ने **मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम** पारित किया, जिसके तहत तत्काल तीन तलाक को अपराध की श्रेणी में रखा गया।
‘पहले अपना घर सुधारें’
जावेद अख्तर ने कहा कि किसी भी समुदाय को अपनी आंतरिक सामाजिक समस्याओं पर सवाल उठाने और सुधार की कोशिश करने से पीछे नहीं हटना चाहिए। उन्होंने खुद को नास्तिक बताते हुए कहा कि उनका जन्म मुस्लिम परिवार में हुआ है और इसलिए अपने समुदाय की कमियों पर बोलना उनका अधिकार और जिम्मेदारी दोनों है।
उन्होंने हिंदू पर्सनल लॉ में हुए सुधारों का उदाहरण देते हुए **हिंदू कोड बिल** और महिलाओं के संपत्ति अधिकारों में हुए बदलावों का भी जिक्र किया। उनका कहना था कि सामाजिक सुधारों को लेकर हर समुदाय के भीतर प्रगतिशील आवाजों को सामने आना चाहिए।
जावेद अख्तर का यह बयान मुस्लिम पर्सनल लॉ, सामाजिक सुधार और धर्मनिरपेक्षता को लेकर चल रही पुरानी बहस को एक बार फिर चर्चा में ले आया है।