मथुरा में 2019 में करीब 150 पीतल की टोंटी बनाने वाली इकाइयां थीं, जो अब घटकर 35-40 रह गई हैं। पीतल स्क्रैप के दाम दो साल में 400-450 से बढ़कर 900-950 रुपये किलो हो गए हैं। कारोबारियों ने कच्चे माल पर नियंत्रण और सरकारी प्रोजेक्ट में स्थानीय उत्पाद को प्राथमिकता की मांग की है।
मथुरा। कभी देशभर में मशहूर रहा मथुरा का पीतल की टोंटी (नल) बनाने का कारोबार मुश्किल दौर से गुज़र रहा है। 2019 में जिले में करीब 150 इकाइयां थीं, जो अब घटकर सिर्फ 35-40 रह गई हैं। कई कारखाने बंद हो चुके हैं और उनमें काम करने वाले कारीगर दूसरे काम तलाश रहे हैं।
दो साल में दोगुना हुआ पीतल
टोंटी बनाने में इस्तेमाल होने वाला पीतल स्क्रैप दो साल पहले 400 से 450 रुपये किलो मिलता था। अब इसका दाम 900 से 950 रुपये किलो पहुंच गया है। कच्चे माल के दाम दोगुने होने से उत्पादन लागत बहुत बढ़ गई है, जबकि बाज़ार में दाम बढ़ाना मुश्किल है।
प्लास्टिक की टोंटियों से मुकाबला
कारोबारियों का कहना है कि बाज़ार में प्लास्टिक (पीटीएमटी) की सस्ती टोंटियों का चलन बढ़ गया है। उन्हें उम्मीद थी कि हर घर नल योजना यानी जल जीवन मिशन से उनके कारोबार को सहारा मिलेगा, लेकिन वह फायदा नहीं मिला।
कारोबारियों की मांग
टैप्स एंड कॉक्स एसोसिएशन के अध्यक्ष नीरज वशिष्ठ ने कहा कि उत्पादन लागत बहुत बढ़ गई है और सरकारी योजनाओं से जो फायदा मिलना था, वह नहीं मिला। उन्होंने कच्चे माल के दाम पर नियंत्रण और सरकारी परियोजनाओं में स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देने की मांग की।
एसोसिएशन के सचिव आनंद माहेश्वरी के मुताबिक इस कारोबार में मुनाफा सिर्फ 10-12 फीसदी रह गया है, जबकि 18 फीसदी जीएसटी देना पड़ता है। अगर जल्द मदद नहीं मिली तो यह उद्योग पूरी तरह खत्म हो सकता है। इस कारोबार से बड़ी संख्या में लोगों का सीधा और परोक्ष रोज़गार जुड़ा है।
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