उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। ऐसे में विंध्य क्षेत्र का मिर्जापुर जिला एक बार फिर सियासी चर्चा के केंद्र में है। मां विंध्यवासिनी के प्रसिद्ध धाम, ऐतिहासिक चुनार किले, कालीन और पीतल उद्योग के लिए पहचान रखने वाला यह जिला धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
मिर्जापुर की राजनीति में अपना दल (सोनेलाल) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल की अहम भूमिका रही है। वहीं भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन के चलते जिले में एनडीए का प्रभाव भी लगातार देखने को मिला है। अब सवाल है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में यहां का सियासी समीकरण क्या होगा?
मां विंध्यवासिनी धाम से जुड़ी है मिर्जापुर की पहचान
मिर्जापुर उत्तर प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में गंगा नदी के किनारे बसा हुआ है। यहां स्थित मां विंध्यवासिनी मंदिर देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह 51 शक्तिपीठों में शामिल है।
विंध्याचल की त्रिकोण यात्रा में मां विंध्यवासिनी मंदिर के साथ अष्टभुजा देवी और कालीखोह मंदिर भी शामिल हैं। सालभर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। नवरात्र के दौरान इस क्षेत्र में विशेष रौनक देखने को मिलती है।
चुनार का किला भी है ऐतिहासिक पहचान
मिर्जापुर की पहचान सिर्फ धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं है। यहां स्थित चुनार का ऐतिहासिक किला भी काफी प्रसिद्ध है। ऊंची पहाड़ी पर बना यह किला कई सदियों तक उत्तर भारत की सत्ता और रणनीति का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
इस किले का संबंध राजा विक्रमादित्य, शेरशाह सूरी, हुमायूं, अकबर और अवध के नवाबों से जुड़ा रहा है। ब्रिटिश शासन के दौरान भी मिर्जापुर एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ।
कालीन और पीतल उद्योग से मिलती है वैश्विक पहचान
मिर्जापुर और आसपास का क्षेत्र कालीन उद्योग के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यहां तैयार होने वाले हाथ से बुने ऊनी और रेशमी कालीनों का निर्यात अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व के देशों तक होता है।
इसके अलावा पीतल के बर्तन, हस्तशिल्प और गुलाबी बलुआ पत्थर भी यहां की खास पहचान हैं। चुनार का पत्थर ऐतिहासिक इमारतों और वाराणसी के घाटों में भी इस्तेमाल किया जाता रहा है। कृषि, खनन और लघु उद्योग भी जिले की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
पटेल, बिंद और दलित मतदाता तय करते हैं चुनावी दिशा
मिर्जापुर की राजनीति में जातीय समीकरण काफी अहम माने जाते हैं। यहां पटेल समुदाय को प्रभावशाली वोट बैंक माना जाता है। इसके अलावा बिंद, निषाद, मौर्य, कुशवाहा, यादव और अनुसूचित जाति के मतदाता भी चुनाव परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
पठारी क्षेत्रों में कोल और चेरू समुदायों का प्रभाव है, जबकि मैदानी इलाकों में जाटव और पासी मतदाताओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। शहरी और विंध्याचल क्षेत्रों में सवर्ण मतदाताओं का प्रभाव देखने को मिलता है।
अनुप्रिया पटेल का मजबूत राजनीतिक आधार
मिर्जापुर लोकसभा सीट से अनुप्रिया पटेल लगातार तीन बार 2014, 2019 और 2024 में जीत दर्ज कर चुकी हैं। वह अपना दल (सोनेलाल) की राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के साथ केंद्र सरकार में मंत्री भी हैं।
मिर्जापुर को उनकी पार्टी का मजबूत राजनीतिक गढ़ माना जाता है। वहीं समाजवादी पार्टी भी पटेल वोट बैंक में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती रही है। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के बीच इस वोट बैंक को लेकर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है।
2022 में NDA ने किया था पांचों सीटों पर कब्जा
मिर्जापुर जिले में कुल पांच विधानसभा सीटें हैं। इनमें छानबे (अनुसूचित जाति), मझवां, मिर्जापुर सदर, चुनार और मड़िहान शामिल हैं।
2022 के विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन ने जिले की सभी पांच सीटों पर जीत दर्ज की थी।
- छानबे: अपना दल (एस) के राहुल प्रकाश कोल विजयी हुए। उनके निधन के बाद 2023 के उपचुनाव में रिंकी कोल ने जीत दर्ज की।
- मझवां: निषाद पार्टी के डॉ. विनोद कुमार बिंद ने जीत हासिल की।
- मिर्जापुर सदर: बीजेपी के रत्नाकर मिश्र ने चुनाव जीता।
- चुनार: बीजेपी के अनुराग सिंह ने जीत दर्ज की।
- मड़िहान: बीजेपी के रमाशंकर सिंह पटेल विजयी हुए।
2017 में भी एनडीए गठबंधन ने जिले की सभी पांच विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की थी।
2027 में किसके पक्ष में जाएगा मिर्जापुर?
लगातार दो विधानसभा चुनावों में पांचों सीटों पर एनडीए की जीत और अनुप्रिया पटेल की लोकसभा में लगातार सफलता ने मिर्जापुर को एनडीए के लिए महत्वपूर्ण जिला बना दिया है। हालांकि 2027 के चुनाव में जातीय समीकरण, स्थानीय विकास, रोजगार, उद्योगों की स्थिति और विपक्ष की रणनीति अहम भूमिका निभा सकती है।
फिलहाल चुनाव में अभी समय है, लेकिन मिर्जापुर की पांचों विधानसभा सीटों पर राजनीतिक दलों की नजरें टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में यहां की सियासी गतिविधियां और भी दिलचस्प हो सकती हैं।