उत्तर प्रदेश में कार्यवाहक प्रधानाध्यापकों को बड़ी राहत देते हुए पात्र शिक्षकों को प्रधानाध्यापक पद के समान वेतन देने के निर्देश जारी किए गए हैं। हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में जिला बेसिक शिक्षा अधिकारियों (BSA) को शिक्षकों की सेवा अवधि और वास्तविक जिम्मेदारी की जांच करने को कहा गया है।
उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में वर्षों से प्रधानाध्यापक की जिम्मेदारी निभा रहे शिक्षकों के वेतन से जुड़ा मामला एक बार फिर चर्चा में है। जिन विद्यालयों में प्रधानाध्यापक का पद खाली है, वहां स्कूल की व्यवस्था संभालने वाले वरिष्ठ शिक्षकों को अब निर्धारित शर्तें पूरी करने पर उसी पद के अनुरूप वेतन मिल सकेगा। शासन ने हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में इस संबंध में संशोधित निर्देश जारी किए हैं। इससे उन पात्र शिक्षकों को राहत मिलने की उम्मीद है, जो लंबे समय से अतिरिक्त जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, लेकिन उन्हें प्रधानाध्यापक पद के अनुरूप वेतन नहीं मिल रहा था।
जिम्मेदारी निभाने के साथ पांच साल का अनुभव भी जरूरी
इस व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल कार्यवाहक प्रधानाध्यापक का प्रभार संभालना वेतन लाभ पाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। संबंधित शिक्षक को निर्धारित सेवा संबंधी शर्तें पूरी करनी होंगी और यह भी प्रमाणित होना चाहिए कि वह वास्तव में प्रधानाध्यापक का काम कर रहा है। शासन के निर्देशों के मुताबिक, पात्रता का निर्धारण संबंधित जिले के बेसिक शिक्षा अधिकारी करेंगे। अधिकारी विद्यालय में प्रधानाध्यापक के पद की स्थिति, शिक्षक के अनुभव और उसे सौंपी गई जिम्मेदारियों से जुड़े तथ्यों की जांच करेंगे। जांच में पात्र पाए जाने वाले याचिकाकर्ता शिक्षकों के वेतन संबंधी मामले में नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
जिला स्तर पर होगी दावों की पड़ताल
अपर मुख्य सचिव, बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षा पार्थ सारथी सेन शर्मा की ओर से सभी जिलों के बेसिक शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे संशोधित आदेश के अनुसार मामलों का परीक्षण करें। यदि कोई शिक्षक दावा करता है कि उसने रिक्त पद पर प्रधानाध्यापक की जिम्मेदारी निभाई है, तो अधिकारी को संबंधित विद्यालय के रिकॉर्ड और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर इसकी पुष्टि करनी होगी। पांच साल के अनुभव की शर्त और वास्तविक कार्यभार की जांच के बाद ही तय होगा कि संबंधित शिक्षक वेतन लाभ का पात्र है या नहीं। इस प्रक्रिया का उद्देश्य पात्र शिक्षकों को लाभ देना और अपात्र दावों पर रोक लगाना है।
पदोन्नति में देरी से बनी कार्यवाहक व्यवस्था
परिषदीय विद्यालयों में प्रधानाध्यापक के पद लंबे समय से खाली रहने का मुद्दा शिक्षकों के बीच महत्वपूर्ण रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 2016 के बाद पदोन्नति नहीं होने से अनेक विद्यालयों में रिक्तियां बनी रहीं। स्कूलों का दैनिक संचालन प्रभावित न हो, इसके लिए वरिष्ठ सहायक अध्यापकों को कार्यवाहक प्रधानाध्यापक की जिम्मेदारी सौंपी गई। इन शिक्षकों को पढ़ाई से जुड़े कार्यों के साथ विद्यालय के प्रशासनिक संचालन की जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ती हैं। इसी परिस्थिति में शिक्षकों ने मांग उठाई कि जब उनसे उच्च पद का काम लिया जा रहा है, तो वेतन भी उसी पद के अनुरूप मिलना चाहिए।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद आगे बढ़ी कार्रवाई
मई 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निर्धारित शर्तें पूरी करने वाले शिक्षकों को प्रधानाध्यापक पद के वेतन का लाभ देने के पक्ष में आदेश दिया था। इसके बाद शासन की ओर से निर्देश जारी किए गए, लेकिन पात्रता और वेतन भुगतान को लेकर आगे संशोधित दिशानिर्देशों की जरूरत पड़ी। अब जिला स्तर पर जांच के माध्यम से संबंधित शिक्षकों के मामलों का निस्तारण किया जाना है। वेतन के साथ बकाया भुगतान यानी एरियर का निर्धारण भी लागू न्यायिक आदेशों और संबंधित शिक्षक के मामले के अनुसार किया जाएगा। <Cite refs={["turn541845search10","turn541845search1"]}/>
किन शिक्षकों को होगा सबसे अधिक फायदा?
इस फैसले से उन याचिकाकर्ता शिक्षकों को राहत मिलने की संभावना है, जो निर्धारित पांच साल के अनुभव की शर्त पूरी करते हैं और वास्तविक रूप से रिक्त प्रधानाध्यापक पद की जिम्मेदारी संभालते रहे हैं। हालांकि, प्रत्येक मामले में अंतिम निर्णय संबंधित रिकॉर्ड और पात्रता की जांच के बाद ही होगा। इसलिए शिक्षकों के लिए अपने कार्यभार, सेवा अवधि और संबंधित आदेशों से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध रखना उपयोगी रहेगा।
अब निगाहें बेसिक शिक्षा अधिकारियों की जांच और उसके बाद होने वाली कार्रवाई पर रहेंगी। पात्र शिक्षकों को प्रधानाध्यापक पद के अनुरूप वेतन कब और किस अवधि से मिलेगा, यह संबंधित मामले में लागू आदेशों तथा जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगा।