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सितंबर में बिजली की कमी तीन साल के उच्चतम स्तर पर, कमज़ोर मानसून और घटे हाइड्रो उत्पादन का असर

देश में सितंबर में बिजली की कमी 56 करोड़ यूनिट तक पहुंच गई, जो अगस्त 2023 के बाद सबसे ज़्यादा है। 2015 के बाद के सबसे कमज़ोर मानसून से पनबिजली उत्पादन करीब 16 फीसदी घटा। केंद्र ने 100 से ज़्यादा कैप्टिव कोयला बिजलीघरों को साल के अंत तक पूरी क्षमता पर चलाने को कहा है।

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मुख्य संपादक

1 मिनट नई दिल्ली

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सितंबर में बिजली की कमी तीन साल के उच्चतम स्तर पर, कमज़ोर मानसून और घटे हाइड्रो उत्पादन का असर
प्रतीकात्मक फोटो: Biswarup Ganguly / Wikimedia Commons (CC BY 3.0)

नई दिल्ली। देश में बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर बढ़ गया है। सितंबर महीने में बिजली की कमी तीन साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई। सितंबर में कुल कमी करीब 560 मिलियन किलोवाट घंटा, यानी लगभग 56 करोड़ यूनिट रही, जो अगस्त 2023 के बाद सबसे ज़्यादा है।

कमज़ोर मानसून बना बड़ी वजह

जून से सितंबर तक मानसून में सामान्य से करीब 13 फीसदी कम बारिश हुई, जिसे 2015 के बाद सबसे कमज़ोर मानसून बताया जा रहा है। अल नीनो के असर से कम बारिश होने पर नदियों और बांधों में पानी कम रहा, जिससे सितंबर में पनबिजली उत्पादन पिछले साल के मुकाबले करीब 16 फीसदी घट गया। लगातार पांचवें महीने पनबिजली उत्पादन में गिरावट दर्ज हुई।

कोयले की आपूर्ति पर भी असर

बारिश असमान होने से पूर्वी भारत के कुछ कोयला क्षेत्रों में बाढ़ आ गई, जिससे कोयले का उत्पादन और ढुलाई प्रभावित हुई। बिजलीघरों में कोयले का भंडार करीब तीन साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। उधर उद्योगों में बिजली की मांग तेज़ी से बढ़ी।

शाम को सबसे ज़्यादा कमी

महीने के आधे से ज़्यादा दिनों में शाम के समय, जब मांग सबसे ज़्यादा होती है, कमी 2 गीगावाट से ऊपर रही और कुछ दिनों में 6 गीगावाट तक पहुंच गई। इसी वजह से कई राज्यों में शाम के वक्त कटौती की शिकायतें बढ़ीं।

सरकार का कदम

त्योहारों और सर्दियों में मांग बढ़ने की आशंका को देखते हुए केंद्र सरकार ने 100 से ज़्यादा कैप्टिव कोयला बिजलीघरों को 1 अक्टूबर से साल के अंत तक पूरी क्षमता पर चलाने के निर्देश दिए हैं, ताकि ग्रिड को अतिरिक्त बिजली मिल सके।

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