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लखनऊ में बीमा कंपनियों के अधिकारियों को दिया जा रहा 40 घंटे का मध्यस्थता प्रशिक्षण,

लखनऊ के गोमतीनगर स्थित न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (जेटीआरआई) में बीमा कंपनियों के नामित अधिकारियों के लिए 40 घंटे का मध्यस्थता प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया है। ‘मीडिएशन फॉर द नेशन 3.0’ अभियान के तहत आयोजित यह प्रशिक्षण 16 अक्टूबर तक चलेगा।

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Pawan Kumar

7 मिनट लखनऊ

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लखनऊ में बीमा कंपनियों के अधिकारियों को दिया जा रहा 40 घंटे का मध्यस्थता प्रशिक्षण,
उत्तर प्रदेश में बीमा संबंधी विवादों के त्वरित और सौहार्दपूर्ण समाधान को बढ़ावा देने के लिए उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से महत्वपूर्ण पहल की गई है।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बीमा संबंधी विवादों के त्वरित और सौहार्दपूर्ण समाधान को बढ़ावा देने के लिए उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से महत्वपूर्ण पहल की गई है। बीमा कंपनियों के नामित अधिकारियों के लिए 40 घंटे का मध्यस्थता प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य बीमा विवादों के निस्तारण में मध्यस्थता की भूमिका को मजबूत करना, लंबित मुकदमों की संख्या कम करने में सहयोग देना और दावेदारों को समय पर राहत उपलब्ध कराने की दिशा में प्रभावी कदम उठाना है।

यह प्रशिक्षण कार्यक्रम भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश एवं राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के कार्यपालक अध्यक्ष न्यायमूर्ति विक्रम नाथ के संरक्षण में तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के मुख्य संरक्षक न्यायमूर्ति अरुण भंसाली के मार्गदर्शन में आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम का संचालन इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश एवं उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यपालक अध्यक्ष न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा के निर्देशानुसार किया जा रहा है।

 बीमा विवादों के समाधान में मध्यस्थता पर जोर

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम को सर्वोच्च न्यायालय की मध्यस्थता एवं सुलह परियोजना समिति (MCPC) द्वारा तैयार किए गए व्यवस्थित पाठ्यक्रम के अंतर्गत संचालित किया जा रहा है। इसमें बीमा कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों और नामित प्रतिनिधियों को मध्यस्थता के सिद्धांतों, व्यावहारिक प्रक्रियाओं तथा विवाद समाधान की आधुनिक तकनीकों से परिचित कराया जा रहा है।

कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य मध्यस्थता को बीमा संबंधी विवादों के समाधान के लिए प्रभावी, समयबद्ध और सभी पक्षों के हितों को ध्यान में रखने वाले विकल्प के रूप में प्रोत्साहित करना है। इसके माध्यम से ऐसे मामलों में आपसी सहमति से समाधान तलाशने पर जोर दिया जा रहा है, जिनमें कानून इसकी अनुमति देता है और जहां मध्यस्थता उपयुक्त हो।

मध्यस्थता केवल विवाद का निपटारा करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह पक्षकारों के बीच संवाद स्थापित करने, आपसी विश्वास विकसित करने और सम्मानजनक तरीके से समाधान तक पहुंचने का माध्यम भी है। इसके जरिए दोनों पक्ष अपनी बात रख सकते हैं और एक ऐसा समझौता तलाश सकते हैं, जो लागू कानून के अनुरूप हो तथा संबंधित पक्षों को स्वीकार्य हो।

 उत्तर प्रदेश में दो लाख से अधिक मोटर दुर्घटना दावा मामले लंबित

बीमा विवादों के समाधान में मध्यस्थता की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए बताया गया कि उत्तर प्रदेश के विभिन्न न्यायालयों और अधिकरणों में बड़ी संख्या में ऐसे मामले लंबित हैं, जिनमें बीमा कंपनियां पक्षकार हैं। इनमें मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के समक्ष लंबित मामलों की संख्या दो लाख से अधिक बताई गई है।

यह आंकड़ा अपीलों और विशेष अनुमति याचिकाओं (SLPs) को शामिल किए बिना बताया गया है। लंबित मामलों की इतनी बड़ी संख्या न्यायिक व्यवस्था के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती प्रस्तुत करती है। इन मामलों के निस्तारण में समय लगने से दावेदारों को आर्थिक और मानसिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

मोटर दुर्घटना से जुड़े मामलों में कई बार पीड़ित परिवारों को उपचार, आजीविका और अन्य आवश्यक खर्चों के लिए आर्थिक सहायता की जरूरत होती है। ऐसे में मुआवजे से संबंधित विवादों का उचित और समयबद्ध समाधान उनके लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। मध्यस्थता के माध्यम से उपयुक्त मामलों में आपसी सहमति से समझौते की संभावनाएं तलाशने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि दावेदारों को राहत मिलने में अनावश्यक देरी कम की जा सके।

 बीमा कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों को दिया जा रहा प्रशिक्षण

बीमा विवादों में प्रभावी समाधान के लिए केवल मध्यस्थता की जानकारी पर्याप्त नहीं है, बल्कि संबंधित पक्षों के प्रतिनिधियों के पास उचित निर्णय लेने की क्षमता भी होनी चाहिए। इसी उद्देश्य से बीमा कंपनियों से ऐसे वरिष्ठ अधिकारियों को प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए नामित करने का अनुरोध किया गया, जो मामलों के समाधान और समझौते से जुड़े निर्णय लेने में सक्षम हों।

प्रशिक्षण के दौरान अधिकारियों को समझाया जा रहा है कि विवादों को केवल मुकदमेबाजी के नजरिए से देखने के बजाय, उपयुक्त मामलों में संवाद और समझौते की संभावनाओं पर भी विचार किया जाना चाहिए। इससे न्यायालयों में लंबित मामलों के समाधान की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने में सहायता मिल सकती है।

कार्यक्रम में अधिकारियों की व्यावहारिक क्षमता विकसित करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि वे मध्यस्थता की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग ले सकें और कानून के दायरे में रहते हुए विवादों के समाधान में रचनात्मक भूमिका निभा सकें।

 7 अक्टूबर को बीमा कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ हुई थी बैठक

उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यपालक अध्यक्ष की अध्यक्षता में 7 अक्टूबर 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बीमा कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक में बीमा विवादों के समाधान में मध्यस्थता की उपयोगिता और बीमा कंपनियों की भूमिका पर चर्चा की गई।

बैठक के दौरान न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा ने इस बात पर जोर दिया कि बीमा कंपनियों के पास अपने संस्थागत और वित्तीय संसाधनों के कारण समझौते की प्रक्रिया को सुगम बनाने की क्षमता है। उन्होंने कहा कि इस क्षमता का उपयोग निष्पक्षता और उत्तरदायित्व के साथ किया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि व्यक्तिगत दावेदारों की स्थिति अक्सर बड़ी बीमा कंपनियों की तुलना में कमजोर होती है। ऐसे में दावों के समाधान के दौरान संवेदनशीलता और न्यायसंगत दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। जहां मध्यस्थता के जरिए निष्पक्ष और कानूनसम्मत समझौता संभव हो, वहां विशेष रूप से नाबालिग दावेदारों को लंबे समय तक मुकदमेबाजी की प्रक्रिया से गुजरने से बचाने के प्रयास किए जाने चाहिए।

बैठक में बीमा कंपनियों से दावों के निस्तारण के प्रति सकारात्मक, संवेदनशील और रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह किया गया।

 संवाद और समझौता-वार्ता की तकनीकों पर विशेष प्रशिक्षण

40 घंटे के इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में मध्यस्थता के व्यावहारिक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इसमें अधिकारियों को प्रभावी संवाद स्थापित करने, बातचीत के जरिए समाधान तलाशने और विवाद के मूल मुद्दों की पहचान करने जैसे कौशल सिखाए जा रहे हैं।

प्रशिक्षण के प्रमुख विषयों में शामिल हैं:

- प्रभावी संवाद और बातचीत की तकनीकें।
- समझौता-वार्ता को आगे बढ़ाने के तरीके।
- विवाद से जुड़े प्रमुख मुद्दों की पहचान।
- समाधान के विभिन्न विकल्पों की तलाश।
- सभी संबंधित पक्षों को स्वीकार्य समझौते तक पहुंचाने की प्रक्रिया।
- मध्यस्थता के दौरान निष्पक्षता और कानूनसम्मत प्रक्रिया का पालन।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय की मध्यस्थता एवं सुलह परियोजना समिति (MCPC) के मास्टर प्रशिक्षकों ने कार्यक्रम में मध्यस्थता की प्रक्रिया, समझौता-वार्ता की तकनीकों और सौहार्दपूर्ण विवाद समाधान के बुनियादी सिद्धांतों पर अपनी विशेषज्ञता साझा की। उनके व्यावहारिक अनुभव के माध्यम से अधिकारियों को वास्तविक मामलों में मध्यस्थता की संभावनाओं को समझने में मदद देने पर जोर दिया गया।

 मध्यस्थता से दावेदारों को कैसे मिल सकती है राहत?

मध्यस्थता का एक प्रमुख लाभ यह है कि उपयुक्त मामलों में पक्षकार आपसी बातचीत के माध्यम से विवाद का समाधान खोज सकते हैं। यदि सभी संबंधित पक्ष स्वेच्छा से किसी निष्पक्ष और कानूनसम्मत समझौते पर पहुंचते हैं, तो इससे लंबी मुकदमेबाजी की आवश्यकता कम हो सकती है।

इस प्रक्रिया से दावेदारों पर पड़ने वाला मानसिक और आर्थिक दबाव कम करने, न्यायालयों के समय और संसाधनों की बचत करने तथा पात्र दावेदारों को समय पर मुआवजा दिलाने में सहायता मिल सकती है।

हालांकि, मध्यस्थता के माध्यम से समाधान तभी संभव है, जब संबंधित मामला इसके लिए उपयुक्त हो और लागू कानून के अनुसार इसकी अनुमति हो। इसका उद्देश्य किसी पक्ष पर समझौते का दबाव बनाना नहीं, बल्कि निष्पक्ष बातचीत के जरिए स्वीकार्य समाधान तलाशना है।

न्याय तक पहुंच आसान बनाने की दिशा में पहल

उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की यह पहल वैकल्पिक विवाद समाधान व्यवस्था को मजबूत करने और बीमा कंपनियों सहित संस्थागत पक्षकारों की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। प्रशिक्षण के माध्यम से बीमा कंपनियों के अधिकारियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वे मुकदमेबाजी से पहले और मुकदमे के विभिन्न चरणों में, जहां उचित हो, मध्यस्थता के विकल्प पर विचार करें।

इससे न्यायालयों में लंबित मामलों के निस्तारण में सहयोग मिलने और दावेदारों को राहत उपलब्ध कराने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। साथ ही, विवादों को अनावश्यक रूप से लंबा खींचने के बजाय संवाद और समझौते के जरिए हल करने की संस्कृति विकसित करने में भी मदद मिल सकती है।

कुल मिलाकर, लखनऊ में आयोजित 40 घंटे का यह मध्यस्थता प्रशिक्षण कार्यक्रम बीमा विवादों के समाधान को अधिक समयबद्ध, सुलभ और प्रभावी बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई पहल है। उत्तर प्रदेश में मोटर दुर्घटना दावा अधिकरणों के समक्ष दो लाख से अधिक लंबित मामलों के संदर्भ में यह कार्यक्रम विशेष महत्व रखता है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रशिक्षण प्राप्त अधिकारी अपने व्यावहारिक कार्यों में मध्यस्थता के सिद्धांतों को किस तरह लागू करते हैं और पात्र दावेदारों को निष्पक्ष एवं समय पर राहत दिलाने में कितना योगदान देते हैं।

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