एक परिवार को भरोसा था कि बेटे की जिंदगी का बीमा मुश्किल वक्त में आर्थिक सहारा बनेगा, लेकिन 30 साल की उम्र में बेटे की मौत के बाद जब पिता ने 5 लाख रुपये का डेथ क्लेम मांगा तो बीमा कंपनी ने भुगतान से इनकार कर दिया। मामला श्री मुक्तसर साहिब जिला उपभोक्ता विवाद…
एक परिवार को भरोसा था कि बेटे की जिंदगी का बीमा मुश्किल वक्त में आर्थिक सहारा बनेगा, लेकिन 30 साल की उम्र में बेटे की मौत के बाद जब पिता ने 5 लाख रुपये का डेथ क्लेम मांगा तो बीमा कंपनी ने भुगतान से इनकार कर दिया। मामला श्री मुक्तसर साहिब जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग पहुंचा, जहां आयोग ने बीमा कंपनी की दलीलों और उपलब्ध दस्तावेजों की जांच के बाद क्लेम देने का आदेश दिया।
मामला अप्रैल 2022 में शुरू हुआ, जब मृतक युवक ने LIC की एक बीमा पॉलिसी ली थी, जिसकी मैच्योरिटी अप्रैल 2043 में होनी थी। अगस्त 2023 में हार्ट अटैक के कारण युवक की मौत हो गई। पॉलिसी में उसके पिता नॉमिनी थे। बेटे की मौत के बाद उन्होंने 5 लाख रुपये के डेथ क्लेम के लिए LIC में आवेदन किया, लेकिन जनवरी 2024 में कंपनी ने उनका दावा खारिज कर दिया। LIC का कहना था कि पॉलिसी लेते समय युवक ने अपनी पुरानी हृदय संबंधी बीमारी और इलाज की जानकारी छिपाई थी।
बीमा कंपनी ने दावा किया कि युवक के दिल में छेद था और साल 2008 में उसका ASD/VSD क्लोजर और Fontan प्रक्रिया से इलाज हुआ था। LIC के मुताबिक, प्रस्ताव फॉर्म में स्वास्थ्य संबंधी सवालों के जवाब देते समय इस मेडिकल हिस्ट्री की जानकारी नहीं दी गई थी। कंपनी का तर्क था कि अगर यह जानकारी पहले सामने आती तो पॉलिसी जारी करने का फैसला अलग हो सकता था।
वहीं मृतक के पिता ने LIC की दलील का विरोध किया। उनका कहना था कि जिस कथित हृदय संबंधी बीमारी और इलाज का हवाला दिया जा रहा है, वह बेटे के नाबालिग रहने के दौरान, पॉलिसी लेने से करीब 14-15 साल पहले का था। मामले की सुनवाई के दौरान उपभोक्ता आयोग ने LIC से इस पुराने इलाज के समर्थन में मेडिकल रिकॉर्ड और ठोस दस्तावेजों की जानकारी मांगी।
आयोग ने पाया कि LIC अपने आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त और भरोसेमंद मेडिकल रिकॉर्ड पेश नहीं कर सकी। जिस पुराने हृदय उपचार का कंपनी ने हवाला दिया था, उससे जुड़े जरूरी दस्तावेज रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं थे। आयोग ने LIC द्वारा पेश किए गए शुरुआती प्रस्ताव फॉर्म की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाया। आयोग के मुताबिक, फॉर्म केवल दो पन्नों का था और उस पर मृतक के हस्ताक्षर तथा जमा करने की तारीख भी दर्ज नहीं थी।
सुनवाई के बाद आयोग ने माना कि केवल बीमारी छिपाने का आरोप लगाकर डेथ क्लेम को खारिज करना पर्याप्त नहीं है, खासकर तब जब बीमा कंपनी अपने आरोपों के समर्थन में ठोस मेडिकल सबूत पेश नहीं कर पाई हो। आयोग ने LIC को मृतक के पिता को 5 लाख रुपये का डेथ क्लेम देने का आदेश दिया। इसके अलावा 10 हजार रुपये मुआवजे और मुकदमे के खर्च के तौर पर देने का भी निर्देश दिया गया। यह फैसला 1 सितंबर को श्री मुक्तसर साहिब जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने सुनाया।