सितंबर 2026 में देश के ईंधन बाजार से जुड़े आंकड़ों ने एक अलग तस्वीर सामने रखी है। एक तरफ पेट्रोल और डीजल की बिक्री में पिछले साल के मुकाबले अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, तो दूसरी तरफ एलपीजी की खपत में बड़ी गिरावट देखने को मिली है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल यानी PPAC के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में एलपीजी की खपत सालाना आधार पर 9.15 फीसदी घटकर करीब 2.64 मिलियन टन रह गई। वहीं पेट्
पेट्रोल-डीजल की बंपर बिक्री, लेकिन LPG की खपत घटी, जानिए क्यों
सितंबर 2026 में देश के पेट्रोलियम बाजार से जुड़े आंकड़ों में बड़ा अंतर देखने को मिला है। पेट्रोल और डीजल की बिक्री में पिछले साल के मुकाबले बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि एलपीजी की खपत में करीब 9 फीसदी की गिरावट आई है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल यानी PPAC के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में एलपीजी की खपत सालाना आधार पर 9.15 फीसदी घटकर 2.64 मिलियन टन रह गई। इसके विपरीत पेट्रोल और डीजल की मांग में तेजी दर्ज की गई। आंकड़े ऐसे समय में सामने आए हैं, जब देश में अलग-अलग ईंधनों की मांग का रुझान एक जैसा नहीं रहा।
PPAC के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में डीजल की बिक्री पिछले साल के मुकाबले 4.86 फीसदी बढ़कर 7.12 मिलियन टन पहुंच गई। वहीं पेट्रोल की बिक्री में 7.21 फीसदी का इजाफा हुआ और यह बढ़कर 3.64 मिलियन टन हो गई। डीजल का इस्तेमाल मुख्य रूप से परिवहन, माल ढुलाई, कृषि और कई औद्योगिक गतिविधियों में होता है, जबकि पेट्रोल की मांग मुख्य रूप से निजी वाहनों और दूसरे परिवहन साधनों से जुड़ी रहती है। ऐसे में इन दोनों ईंधनों की बिक्री में बढ़ोतरी देश में परिवहन और आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी ईंधन मांग में बदलाव को दर्शाती है।
दूसरी तरफ एलपीजी की खपत में दर्ज गिरावट ने बाजार का ध्यान खींचा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर एलपीजी की अंतरराष्ट्रीय सप्लाई पर पड़ा। भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। क्षेत्रीय तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई और उपलब्धता को लेकर दबाव बढ़ा, जिसका असर भारत में भी देखने को मिला। एलपीजी की उपलब्धता और सप्लाई को लेकर दबाव के बीच रिफिल व्यवस्था में भी बदलाव किए गए। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ समय के लिए सिलेंडर रिफिल बुकिंग की समय सीमा में बदलाव किया गया, जिससे खपत के आंकड़ों पर असर पड़ा।
हालांकि, एलपीजी की खपत में 9.15 फीसदी की गिरावट का सीधा मतलब यह नहीं है कि देश में लोगों ने खाना पकाने के लिए एलपीजी का इस्तेमाल कम कर दिया है। देश के करोड़ों घरों में आज भी घरेलू एलपीजी सिलेंडर खाना पकाने का प्रमुख साधन है। घरेलू उपभोक्ताओं के लिए आमतौर पर 14.2 किलोग्राम वाले सिलेंडर का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए सितंबर के आंकड़ों को केवल घरेलू मांग में कमी के रूप में देखना सही नहीं होगा। सप्लाई में बाधा, उपलब्धता और रिफिल की स्थिति जैसे कारक भी कुल बिक्री और खपत को प्रभावित कर सकते हैं।
मिडिल ईस्ट में तनाव का असर ऊर्जा बाजार के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस क्षेत्र का वैश्विक तेल और गैस सप्लाई में बड़ा योगदान है। किसी भी बड़े भू-राजनीतिक तनाव से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परिवहन, शिपमेंट और सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। भारत के मामले में एलपीजी का आयात महत्वपूर्ण होने के कारण अंतरराष्ट्रीय सप्लाई में आने वाले बदलाव का असर घरेलू उपलब्धता पर भी पड़ सकता है। ऐसे में सितंबर में एलपीजी की खपत में आई गिरावट के पीछे केवल उपभोक्ता मांग को जिम्मेदार मानना पर्याप्त नहीं होगा।
पेट्रोल और डीजल की बिक्री के आंकड़े दूसरी तस्वीर पेश करते हैं। सितंबर में डीजल की बिक्री 7.12 मिलियन टन और पेट्रोल की बिक्री 3.64 मिलियन टन रही। दोनों में सालाना आधार पर बढ़ोतरी दर्ज की गई। पेट्रोल और डीजल की मांग में बदलाव कई कारणों से प्रभावित होती है, जिनमें सड़क परिवहन, माल ढुलाई, कृषि गतिविधियां और वाहन इस्तेमाल शामिल हैं। इसलिए केवल एक महीने के आंकड़ों के आधार पर लंबे समय के रुझान का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
एलपीजी की खपत में गिरावट के बावजूद देश में घरेलू गैस का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर जारी है। सरकार और तेल कंपनियों के लिए एलपीजी की उपलब्धता और नियमित सप्लाई बनाए रखना महत्वपूर्ण है, खासकर ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता बनी हुई है। अगर वैश्विक सप्लाई की स्थिति सामान्य होती है और घरेलू बाजार में रिफिल की उपलब्धता बेहतर रहती है, तो आने वाले महीनों के आंकड़ों में बदलाव देखने को मिल सकता है।
कुल मिलाकर सितंबर 2026 के शुरुआती आंकड़े देश के ईंधन बाजार में अलग-अलग उत्पादों की मांग का अलग रुझान दिखाते हैं। पेट्रोल की बिक्री 7.21 फीसदी और डीजल की बिक्री 4.86 फीसदी बढ़ी, जबकि एलपीजी की खपत 9.15 फीसदी घटकर 2.64 मिलियन टन रह गई। एलपीजी की गिरावट में मिडिल ईस्ट तनाव से जुड़ी सप्लाई और उपलब्धता की स्थिति अहम कारक रही। आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और घरेलू सप्लाई व्यवस्था के आधार पर यह स्पष्ट होगा कि एलपीजी खपत में यह गिरावट कितनी स्थायी रहती है।