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न ईंट, न पत्थर: अफ्रीका बना रहा 8000 KM लंबी ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’, क्या यह चीन की ग्रेट वॉल को पीछे छोड़ देगी?

अफ्रीका महाद्वीप में रेगिस्तान के फैलाव को रोकने और पर्यावरण को बचाने के लिए एक महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम चल रहा है, जिसे ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’ (Great Green Wall) कहा जाता है। यह कोई ईंट-पत्थर की दीवार नहीं है, बल्कि पेड़ों, पौधों और हरित क्षेत्र की एक विशाल…

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V K Singh

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न ईंट, न पत्थर: अफ्रीका बना रहा 8000 KM लंबी ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’, क्या यह चीन की ग्रेट वॉल को पीछे छोड़ देगी?

अफ्रीका महाद्वीप में रेगिस्तान के फैलाव को रोकने और पर्यावरण को बचाने के लिए एक महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम चल रहा है, जिसे ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’ (Great Green Wall) कहा जाता है। यह कोई ईंट-पत्थर की दीवार नहीं है, बल्कि पेड़ों, पौधों और हरित क्षेत्र की एक विशाल श्रृंखला है, जिसे लगभग 8000 किलोमीटर लंबाई में सहारा रेगिस्तान के दक्षिणी किनारे पर विकसित किया जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य रेगिस्तान के विस्तार को रोकना, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करना और स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार एवं कृषि के नए अवसर पैदा करना है।

यह परियोजना मुख्य रूप से Sahel region में विकसित की जा रही है, जो अटलांटिक महासागर से लेकर लाल सागर तक फैला हुआ क्षेत्र है। इसमें कई अफ्रीकी देश शामिल हैं, जैसे Senegal, Nigeria, Ethiopia और अन्य सहेल क्षेत्र के देश। इन देशों का लक्ष्य करोड़ों पेड़ लगाकर एक ऐसी प्राकृतिक दीवार तैयार करना है जो रेगिस्तान के आगे बढ़ते कदमों को रोक सके और मिट्टी की उर्वरता को बहाल कर सके। यह परियोजना केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि गरीबी उन्मूलन और खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ी हुई है।

अगर तुलना की जाए तो चीन की ऐतिहासिक Great Wall of China एक ईंट और पत्थर से बनी रक्षा दीवार है, जिसे आक्रमणों से सुरक्षा के लिए बनाया गया था, जबकि अफ्रीका की यह ‘ग्रीन वॉल’ पूरी तरह प्राकृतिक और पर्यावरणीय उद्देश्य पर आधारित है। चीन की दीवार एक ठोस संरचना है, जबकि अफ्रीका की दीवार पेड़ों और हरित पट्टी के रूप में एक जीवित प्रणाली है। इसलिए दोनों का उद्देश्य और स्वरूप पूरी तरह अलग है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना अपने पूर्ण लक्ष्य तक पहुंचती है, तो यह न केवल दुनिया की सबसे लंबी पर्यावरणीय संरचना बन सकती है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में एक ऐतिहासिक मॉडल भी साबित हो सकती है। हालांकि चुनौतियां अभी भी बड़ी हैं, जैसे राजनीतिक अस्थिरता, धन की कमी और रेगिस्तान के लगातार बढ़ते प्रभाव, लेकिन इसके बावजूद कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर पेड़ लगाए जा चुके हैं और सकारात्मक परिणाम दिखने लगे हैं।

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