चीन में बच्चों से ज्यादा हुई बुजुर्गों की आबादी! भारत में भी लगातार घट रही जन्म दर, क्या आने वाले समय में गहराएगा जनसंख्या संकट? घटते युवा और बढ़ते बुजुर्गों से अर्थव्यवस्था पर कितना पड़ेगा असर?
कुछ दशक पहले तक भारत और चीन जैसे देशों में बढ़ती आबादी को विकास की बड़ी चुनौती माना जाता था। लेकिन अब दुनिया के कई देशों में तस्वीर बदल रही है। चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप के अनेक देशों में जन्म दर में गिरावट चिंता का विषय बन रही है। आबादी विशेषज्ञों के मुताबिक, जब फर्टिलिटी रेट लंबे समय तक रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे रहती है, तो आने वाले वर्षों में आबादी की उम्र संबंधी संरचना बदलने लगती है। इसका असर कामकाजी लोगों की संख्या, अर्थव्यवस्था और बुजुर्गों की देखभाल पर पड़ सकता है।
क्या होती है फर्टिलिटी रेट और क्यों जरूरी है 2.1 का आंकड़ा?
फर्टिलिटी रेट का मतलब है कि एक महिला अपने जीवनकाल में औसतन कितने बच्चों को जन्म देती है। विकसित देशों में सामान्य परिस्थितियों में आबादी को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखने के लिए लगभग 2.1 की कुल प्रजनन दर को रिप्लेसमेंट लेवल माना जाता है। यह आंकड़ा मृत्यु दर और अन्य जनसांख्यिकीय परिस्थितियों को ध्यान में रखता है। हालांकि, फर्टिलिटी रेट इससे नीचे आने का मतलब यह नहीं है कि आबादी तुरंत घटने लगेगी। इसका प्रभाव समय के साथ दिखाई देता है और प्रवासन तथा जीवन प्रत्याशा जैसे कारक भी आबादी के आकार को प्रभावित करते हैं।
चीन में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या बनी चुनौती
चीन में जन्म दर में गिरावट के पीछे कई कारण बताए जाते हैं। इनमें लंबे समय तक लागू रही एक-बच्चा नीति, बच्चों की परवरिश का खर्च, शहरी जीवन की बढ़ती लागत और शादी या परिवार शुरू करने में युवाओं की बदलती प्राथमिकताएं शामिल हैं। चीन ने 1980 के दशक में जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित करने के लिए एक-बच्चा नीति लागू की थी, जिसे बाद में धीरे-धीरे समाप्त किया गया और 2015 में इसे खत्म करने की घोषणा हुई।
अब चीन के सामने बढ़ती उम्र वाली आबादी और घटती जन्म दर की चुनौती है। उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक, वहां 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की संख्या करीब 22.3 करोड़, जबकि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की संख्या लगभग 21.3 करोड़ बताई गई है। इन आंकड़ों के आधार पर बुजुर्गों की संख्या बच्चों से अधिक होने की बात सामने आती है। ऐसे बदलाव का असर पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है।
पांच साल से घट रही चीन की आबादी
चीन की आबादी में लगातार गिरावट दर्ज होने की बात रिपोर्टों में सामने आई है। सरकार ने जन्म दर बढ़ाने के लिए परिवारों को प्रोत्साहन देने सहित कई उपाय किए हैं, लेकिन कम जन्म दर की चुनौती बनी हुई है। यदि यह रुझान लंबे समय तक जारी रहता है, तो देश में कामकाजी उम्र के लोगों का अनुपात कम हो सकता है और बुजुर्ग आबादी की हिस्सेदारी बढ़ सकती है। इसका असर उद्योगों में कर्मचारियों की उपलब्धता, आर्थिक विकास और सरकारी खर्च पर पड़ सकता है।
हालांकि, भविष्य में चीन की कुल आबादी कितनी होगी, इसका सटीक अनुमान जन्म दर, मृत्यु दर, प्रवासन और सरकारी नीतियों जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगा।
भारत में भी रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे फर्टिलिटी रेट
भारत में भी पिछले कुछ दशकों के दौरान प्रजनन दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है। खबर में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, देश की औसत फर्टिलिटी रेट लगभग 1.9 बताई गई है, जो 2.1 के रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे है। शिक्षा का विस्तार, शहरीकरण, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, शादी की उम्र में बदलाव और परिवार के आकार को लेकर बदलती सोच इस गिरावट से जुड़े महत्वपूर्ण कारक हैं।
हालांकि, भारत की स्थिति चीन से अलग है। भारत की आबादी अपेक्षाकृत युवा है और अलग-अलग राज्यों में जन्म दर में काफी अंतर है। इसलिए कम फर्टिलिटी रेट का प्रभाव देश के सभी हिस्सों में एक जैसा या एक ही समय पर दिखाई नहीं देगा।
दक्षिण भारत में कम जन्म दर, आगे क्या होंगी चुनौतियां?
केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में प्रजनन दर लंबे समय से कम रही है। कम जन्म दर का दीर्घकालिक असर भविष्य में कामकाजी उम्र की आबादी और बुजुर्गों की संख्या के अनुपात पर पड़ सकता है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन, देखभाल सुविधाओं और सामाजिक सुरक्षा की जरूरत बढ़ सकती है।
दूसरी ओर, कम जन्म दर के कुछ सकारात्मक पहलू भी हो सकते हैं। परिवारों में बच्चों की संख्या कम होने पर शिक्षा और स्वास्थ्य पर प्रति बच्चे अधिक संसाधन खर्च किए जा सकते हैं। इसलिए इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकारें रोजगार, उत्पादकता, स्वास्थ्य सेवाओं और बुजुर्गों की देखभाल के लिए किस तरह की तैयारी करती हैं।
घटती जन्म दर से अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?
यदि किसी देश में लंबे समय तक जन्म दर कम बनी रहती है, तो भविष्य में कामकाजी आबादी का आकार घट सकता है। इससे कुछ क्षेत्रों में कर्मचारियों की कमी, पेंशन व्यवस्था पर दबाव और बुजुर्गों की देखभाल का खर्च बढ़ने जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए कौशल विकास, तकनीक का बेहतर इस्तेमाल, महिलाओं की रोजगार में भागीदारी और वरिष्ठ नागरिकों के लिए मजबूत सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था अहम भूमिका निभा सकती है।
दुनिया के कई देशों में जनसंख्या से जुड़ी चुनौती बढ़ती आबादी से बदलकर घटती जन्म दर और बढ़ती उम्र वाली आबादी की ओर जा रही है। चीन में इसका असर स्पष्ट दिखाई दे रहा है, जबकि भारत में भी फर्टिलिटी रेट रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे बताई जा रही है। आने वाले वर्षों में इस बदलाव का असर कितना होगा, यह जनसांख्यिकीय रुझानों और सरकारों की नीतियों पर निर्भर करेगा।