लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राज्यसभा की 10 सीटों को लेकर सियासी गणित चर्चा में आ गया है। नवंबर 2026 में उत्तर प्रदेश कोटे की 10 राज्यसभा सीटों का कार्यकाल खत्म होना है। इनमें बीजेपी के आठ, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का एक-एक…
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राज्यसभा की 10 सीटों को लेकर सियासी गणित चर्चा में आ गया है। नवंबर 2026 में उत्तर प्रदेश कोटे की 10 राज्यसभा सीटों का कार्यकाल खत्म होना है। इनमें बीजेपी के आठ, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का एक-एक सांसद शामिल है। बीएसपी के मौजूदा राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल भी 25 नवंबर 2026 को पूरा हो रहा है।
ऐसे में राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या बीजेपी अपने संभावित सीट कोटे में से एक सीट बीएसपी के लिए छोड़कर मायावती की पार्टी को राज्यसभा में प्रतिनिधित्व बनाए रखने में मदद कर सकती है? अभी तक बीजेपी या बीएसपी की तरफ से इस तरह के किसी समझौते या सीट देने का आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ है। इसलिए इसे फिलहाल संभावित राजनीतिक समीकरण और चर्चा के तौर पर ही देखा जा रहा है।
विधानसभा में बीएसपी के पास नहीं बचा कोई विधायक
बीएसपी की मौजूदा स्थिति इस राज्यसभा चुनाव को उसके लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण बनाती है। अगस्त 2026 में बलिया की रसड़ा विधानसभा सीट से बीएसपी के इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी का कोई विधायक नहीं बचा है। ऐसे में अपने दम पर राज्यसभा सीट हासिल करना बीएसपी के लिए बेहद कठिन होगा।
राज्यसभा का चुनाव विधानसभा सदस्यों के वोटों से होता है। ऐसे में किसी पार्टी की विधानसभा में संख्या उसके उम्मीदवार की जीत के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है। यही वजह है कि बीएसपी के सामने नवंबर में होने वाले चुनाव को लेकर संख्या बल की चुनौती है।
2020 का राज्यसभा चुनाव क्यों हो रहा याद?
मौजूदा स्थिति में 2020 का राज्यसभा चुनाव उदाहरण के तौर पर सामने आ रहा है। उस समय उत्तर प्रदेश से 10 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव हुआ था। बीजेपी ने आठ उम्मीदवार उतारे थे, जबकि एसपी और बीएसपी की ओर से एक-एक उम्मीदवार मैदान में था। सभी 10 उम्मीदवार बाद में निर्विरोध निर्वाचित हुए थे। इनमें बीएसपी के रामजी गौतम भी शामिल थे।
उस समय बीजेपी ने नौवां उम्मीदवार नहीं उतारा था। राजनीतिक रिपोर्टों में इसे बीएसपी उम्मीदवार रामजी गौतम के निर्विरोध निर्वाचन का एक अहम कारण बताया गया था।
अब छह साल बाद रामजी गौतम का कार्यकाल खत्म होने वाला है और बीएसपी के पास विधानसभा में कोई विधायक नहीं है। इसलिए 2020 की घटना और मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों के बीच तुलना की जा रही है।
2027 से पहले PDA की राजनीति क्यों अहम?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी से राजनीतिक दलों की रणनीति के केंद्र में है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पिछले चुनावों के दौरान PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण को प्रमुखता दी है।
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में एसपी ने 37 सीटें जीती थीं। कांग्रेस को छह और बीजेपी को 33 सीटें मिली थीं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक बीएसपी उत्तर प्रदेश में एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी थी।
इन नतीजों के बाद उत्तर प्रदेश में दलित वोटों के रुझान और बीएसपी के राजनीतिक आधार को लेकर काफी चर्चा हुई। यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दलित राजनीति को लेकर बीजेपी, एसपी और कांग्रेस की रणनीतियों पर नजर है।
बीजेपी के लिए मायावती की पार्टी की भूमिका क्यों चर्चा में?
बीएसपी के कमजोर चुनावी प्रदर्शन के बावजूद मायावती की पार्टी उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदर्भ बनी हुई है। 2024 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी को कोई सीट नहीं मिली, लेकिन पार्टी को राज्य में करीब 9.39 फीसदी वोट मिले थे।
ऐसे में राज्यसभा में बीएसपी का प्रतिनिधित्व बना रहता है या नहीं, यह भी राजनीतिक चर्चा का विषय है। अगर भविष्य में बीजेपी बीएसपी उम्मीदवार को राज्यसभा पहुंचाने में सहयोग करती है, तो इसे दोनों दलों के बीच औपचारिक गठबंधन के तौर पर नहीं देखा जा सकता, जब तक दोनों पार्टियां स्वयं ऐसा कोई समझौता घोषित न करें।
हालांकि, ऐसा कदम दलित राजनीति को लेकर बीजेपी की रणनीति के संदर्भ में राजनीतिक विश्लेषण का विषय जरूर बन सकता है।
क्या इससे अखिलेश के PDA समीकरण पर असर पड़ेगा?
यही वह बिंदु है जिस पर 2027 के चुनाव से पहले सबसे ज्यादा राजनीतिक चर्चा हो सकती है। एसपी का PDA फॉर्मूला पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को एक राजनीतिक सामाजिक समीकरण में जोड़ने की कोशिश पर आधारित है।
अगर बीजेपी और बीएसपी के बीच राज्यसभा चुनाव को लेकर किसी तरह का सहयोग सामने आता है, तो एसपी-कांग्रेस और बीजेपी की दलित राजनीति से जुड़ी रणनीतियों पर इसका असर चर्चा में आ सकता है। लेकिन यह कहना कि इससे निश्चित रूप से किसी दल के वोट बैंक में बदलाव होगा या चुनावी परिणाम प्रभावित होंगे, अभी अनुमान होगा।
बीएसपी के लिए राज्यसभा प्रतिनिधित्व का सवाल
रामजी गौतम के कार्यकाल के खत्म होने के बाद बीएसपी के सामने संसद में अपना प्रतिनिधित्व बनाए रखने की चुनौती है। 2024 लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी के पास लोकसभा में कोई सांसद नहीं है और विधानसभा में भी उमाशंकर सिंह के निधन के बाद उसका कोई विधायक नहीं बचा है।
ऐसे में अगर बीएसपी को राज्यसभा में दोबारा प्रतिनिधित्व मिलता है, तो यह पार्टी के लिए संसद में अपनी मौजूदगी बनाए रखने के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा। दूसरी ओर, यदि पार्टी नया राज्यसभा सांसद नहीं चुनवा पाती है, तो संसद के दोनों सदनों में उसका प्रतिनिधित्व समाप्त हो जाएगा। इस स्थिति की संभावना पर भी राजनीतिक रिपोर्टों में चर्चा हो चुकी है।
अभी आधिकारिक फैसले का इंतजार
फिलहाल बीजेपी की ओर से बीएसपी को राज्यसभा सीट देने का कोई आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ है। इसलिए इसे ‘बीजेपी का मायावती को गिफ्ट’ कहना अभी जल्दबाजी होगी। वास्तविक तस्वीर उम्मीदवारों के नाम, नामांकन और चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के बाद ही साफ होगी।
राज्यसभा चुनाव के साथ-साथ 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में तेजी पकड़ेंगी। ऐसे में बीजेपी, एसपी, बीएसपी और कांग्रेस के बीच दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक मतदाताओं को लेकर बनने वाली रणनीतियां आने वाले महीनों में राजनीतिक चर्चा का प्रमुख हिस्सा रह सकती हैं।
फिलहाल सवाल यही है कि क्या 2020 की तरह 2026 में भी बीजेपी बीएसपी उम्मीदवार के लिए राज्यसभा की राह आसान करेगी, या फिर विधानसभा के मौजूदा संख्या बल के आधार पर सभी सीटों पर अपने-अपने उम्मीदवार उतारने का रास्ता अपनाया जाएगा। इसका जवाब आधिकारिक चुनावी प्रक्रिया और दोनों दलों के फैसलों के बाद ही स्पष्ट होगा।