गुजरात के सूरत में कपड़ा और कढ़ाई उद्योग में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों के बीच ‘गांव चलो आंदोलन’ को लेकर हलचल तेज है। मजदूर प्रतिनिधियों ने 8 घंटे की ड्यूटी, साप्ताहिक छुट्टी, समय पर वेतन और श्रम कानूनों के पालन की मांग उठाई है
गुजरात का सूरत शहर इन दिनों कपड़ा उद्योग में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों की घर वापसी को लेकर चर्चा में है। उत्तर प्रदेश और बिहार समेत कई राज्यों से आए श्रमिक बड़ी संख्या में अपने गांव लौट रहे हैं। रेलवे स्टेशनों पर भीड़ और कुछ फैक्ट्रियों में काम प्रभावित होने की खबरों के बीच दावा किया जा रहा है कि करीब 10 लाख मजदूर सूरत छोड़ सकते हैं। हालांकि, इतनी बड़ी संख्या में मजदूरों के पलायन की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह श्रम विवाद के खिलाफ सामूहिक विरोध है या दिवाली और छठ पूजा के लिए हर साल होने वाली घर वापसी इस बार जल्दी शुरू हो गई है?
क्या है सूरत का ‘गांव चलो आंदोलन’?
सूरत के कपड़ा, बुनाई और कढ़ाई उद्योग में लाखों प्रवासी मजदूर काम करते हैं। काम के घंटे, वेतन, साप्ताहिक छुट्टी और श्रम सुविधाओं को लेकर मजदूरों और फैक्ट्री प्रबंधन के बीच लंबे समय से विवाद की स्थिति बनी हुई है। इसी बीच ‘गांव चलो आंदोलन’ चर्चा में आया है।
इस अभियान के तहत मजदूरों से अपील की जा रही है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तो वे कुछ समय के लिए अपने गांव लौटने पर विचार करें। मजदूर प्रतिनिधियों का कहना है कि पहले दिए गए आश्वासनों के बावजूद उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ है।
रिपोर्टों के मुताबिक, मजदूर प्रतिनिधि अजय दुबे ने श्रमिकों से काम की शर्तें स्पष्ट करने, जरूरत पड़ने पर श्रम विभाग में शिकायत दर्ज कराने और नियमों का पालन करने वाली फैक्ट्रियों में काम तलाशने की अपील की। उन्होंने रविवार की सवेतन छुट्टी नहीं मिलने की स्थिति में उस दिन काम बंद रखने पर विचार करने की बात भी कही।
12 घंटे की ड्यूटी और छुट्टी को लेकर नाराजगी
मजदूरों की प्रमुख शिकायत काम के लंबे घंटे और साप्ताहिक अवकाश को लेकर है। कुछ श्रमिकों का आरोप है कि उनसे रोजाना करीब 12 घंटे काम कराया जाता है और महीने में लगभग 30 दिन तक काम करना पड़ता है। रविवार को छुट्टी मांगने या जरूरी काम से अवकाश लेने पर वेतन काटने, बकाया भुगतान रोकने और नौकरी से निकालने जैसी शिकायतें भी सामने आई हैं।
मजदूरों की प्रमुख मांगों में निर्धारित कार्य अवधि का पालन, सप्ताह में एक दिन सवेतन छुट्टी, समय पर वेतन भुगतान और पात्रता के अनुसार भविष्य निधि (PF), कर्मचारी राज्य बीमा (ESI) तथा ग्रेच्युटी जैसी सुविधाएं शामिल हैं।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में सूरत के जिला कलेक्टर कार्यालय पर कपड़ा मजदूरों ने प्रदर्शन किया था। श्रमिकों ने आरोप लगाया था कि पहले आश्वासन मिलने के बाद भी उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ। उन्होंने हर महीने की सात तारीख तक वेतन देने और श्रम कानूनों का सख्ती से पालन कराने की मांग उठाई थी।
अगस्त से ही जारी है श्रम विवाद
सूरत में मौजूदा स्थिति को केवल त्योहारों की घर वापसी से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। अगस्त में अमरोली, कतारगाम, सचिन जीआईडीसी, पीपोदरा और कडोदरा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में भी मजदूरों के विरोध-प्रदर्शन की खबरें सामने आई थीं। कुछ जगहों पर फैक्ट्रियों का काम प्रभावित होने और हिंसा की घटनाओं के बाद पुलिस कार्रवाई की जानकारी भी सामने आई थी।
इन घटनाओं से स्पष्ट है कि काम की शर्तों को लेकर मजदूरों में नाराजगी का मुद्दा पहले से मौजूद है। हालांकि, मौजूदा समय में गांव लौटने वाले कितने मजदूर श्रम विवाद के कारण जा रहे हैं और कितने त्योहार मनाने के लिए, इसका स्पष्ट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
क्या सचमुच 10 लाख मजदूर छोड़ रहे हैं सूरत?
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा करीब 10 लाख मजदूरों के सूरत छोड़ने के दावे की है। लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों से यह पुष्टि नहीं होती कि 10 लाख मजदूर शहर छोड़ चुके हैं या इतनी बड़ी संख्या में लोग केवल श्रम विवाद के कारण लौट रहे हैं।
इंडियन एक्सप्रेस की सितंबर की रिपोर्ट में एक श्रमिक संगठन के ज्ञापन के हवाले से बताया गया था कि सूरत के कपड़ा उद्योग में 18 लाख से अधिक प्रवासी मजदूर काम करते हैं। यह आंकड़ा उद्योग की प्रवासी श्रमिकों पर निर्भरता को दर्शाता है, लेकिन इससे मौजूदा पलायन की संख्या प्रमाणित नहीं होती।
रेलवे स्टेशन पर भीड़ होना अपने आप में सामूहिक पलायन का प्रमाण नहीं है। इसके लिए यात्रियों के सत्यापित आंकड़ों, फैक्ट्रियों में श्रमिकों की उपस्थिति और मजदूरों के घर लौटने की वजह से जुड़ी जानकारी की जरूरत होगी।
दिवाली और छठ पूजा भी घर वापसी की बड़ी वजह
उत्तर प्रदेश और बिहार से सूरत आए श्रमिक हर साल दिवाली और छठ पूजा के दौरान अपने परिवारों के साथ त्योहार मनाने गांव लौटते हैं। यह लंबे समय से चली आ रही परंपरा है। इस बार भी कई मजदूरों की घर वापसी को त्योहारों से जोड़कर देखा जा रहा है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, कपड़ा उद्योग में काम करने वाले हजारों मजदूर त्योहारों के लिए घर लौट रहे हैं। आम तौर पर दिवाली से करीब एक सप्ताह पहले यात्रा शुरू होती है, लेकिन इस बार कुछ श्रमिकों की वापसी पहले शुरू होने की बात सामने आई है।
गुजरात फर्स्ट की 10 अक्टूबर की ग्राउंड रिपोर्ट में सूरत रेलवे स्टेशन पर मिले कुछ मजदूरों ने बताया कि वे दिवाली और छठ पूजा मनाने के लिए अपने परिवारों के साथ गांव जा रहे हैं। इन श्रमिकों ने अपनी यात्रा की वजह बकाया वेतन या नौकरी से निकाले जाने को नहीं बताया।
इसलिए त्योहारों के लिए होने वाली सामान्य घर वापसी और श्रम विवाद के कारण काम छोड़ने की घटनाओं के बीच अंतर करना जरूरी है।
मजदूरों की कमी से प्रभावित हो सकता है कपड़ा उद्योग
सूरत देश के प्रमुख कपड़ा उत्पादन केंद्रों में शामिल है। यहां बुनाई, कढ़ाई, रंगाई, छपाई और कपड़ा निर्माण से जुड़ी इकाइयों में बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक काम करते हैं। ऐसे में कामगारों की उपलब्धता में कमी आने पर उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
यदि मजदूर सामान्य समय से पहले घर लौटते हैं या त्योहारों के बाद काम पर वापस नहीं आते, तो फैक्ट्रियों को श्रमिकों की कमी का सामना करना पड़ सकता है। मौजूदा विवाद के बीच कुछ इकाइयों में काम प्रभावित होने की खबरें भी सामने आई हैं।
क्या है पूरे मामले का निष्कर्ष?
सूरत में मजदूरों की घर वापसी के पीछे दो प्रमुख पहलू दिखाई देते हैं—एक तरफ काम के लंबे घंटे, सवेतन छुट्टी और वेतन से जुड़ी शिकायतें हैं, तो दूसरी तरफ दिवाली और छठ पूजा के लिए गांव लौटने की परंपरा भी है।
करीब 10 लाख मजदूरों के पलायन का दावा अभी आधिकारिक रूप से पुष्ट नहीं है। इसलिए फिलहाल इसे बड़े पैमाने पर प्रमाणित पलायन कहना जल्दबाजी होगी। असली तस्वीर तभी साफ होगी, जब यह सामने आएगा कि कितने मजदूर त्योहार के बाद लौटते हैं, कितने नौकरी छोड़ चुके हैं और श्रम विवाद का उद्योग पर वास्तविक असर कितना पड़ा है।